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Rigveda Mandal 1 / Sukta 58 / Mantra 3

191 Sukta
9 Mantra
1/58/3
Devata- अग्निः Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
क्रा॒णा रु॒द्रेभि॒र्वसु॑भिः पु॒रोहि॑तो॒ होता॒ निष॑त्तो रयि॒षाळम॑र्त्यः। रथो॒ न वि॒क्ष्वृ॑ञ्जसा॒न आ॒युषु॒ व्या॑नु॒षग्वार्या॑ दे॒व ऋ॑ण्वति ॥

क्रो॒णा । रु॒द्रेभिः॑ । वसु॑ऽभिः । पु॒रःऽहि॑तः । होता॑ । निऽस॑त्तः । र॒यि॒षाट् । अम॑र्त्यः । रथः॑ । न । वि॒क्षु । ऋ॒ञ्ज॒सा॒नः । आ॒युषु॑ । वि । आ॒नु॒षक् । वार्या॑ । दे॒वः । ऋ॒ण्व॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
क्राणा रुद्रेभिर्वसुभिः पुरोहितो होता निषत्तो रयिषाळमर्त्यः। रथो न विक्ष्वृञ्जसान आयुषु व्यानुषग्वार्या देव ऋण्वति ॥

क्राणा। रुद्रेभिः। वसुऽभिः। पुरःऽहितः। होता। निऽसत्तः। रयिषाट्। अमर्त्यः। रथः। न। विक्षु। ऋञ्जसानः। आयुषु। वि। आनुषक्। वार्या। देवः। ऋण्वति ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 23 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम जो (रुद्रेभिः) प्राणों और (वसुभिः) वास देनेहारे पृथिवी आदि पदार्थों के साथ (निसत्तः) स्थित चलता फिरता (होता) देहादि का धारण करने हारा (पुरोहितः) प्रथम ग्रहण करने योग्य (रयिषाट्) धन का सहनकर्त्ता (अमर्त्यः) मरणधर्मरहित (क्राणा) कर्मों का कर्त्ता (ऋञ्जसानः) जो किये हुए कर्म को प्राप्त होता (विक्षु) प्रजाओं में (रथो न) रथ के समान शरीरसहित होके (आयुषु) बाल्यादि जीवनावस्थाओं में (आनुषक्) अनुकूलता से वर्त्तमान (वार्या) उत्तम पदार्थ और सुखों को (व्यृण्वति) विविध प्रकार सिद्ध करता है, वही (देवः) शुद्ध प्रकाशस्वरूप जीवात्मा है, ऐसा जानो ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो पृथिवी में प्राणों के साथ चेष्टा, मन के अनुकूल, रथ के समान शरीर के साथ क्रीड़ा, श्रेष्ठ वस्तु और सुख की इच्छा करते हैं, वे ही जीव हैं, ऐसा सब लोग जानें ॥ ३ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥