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Rigveda Mandal 1 / Sukta 57 / Mantra 5

191 Sukta
6 Mantra
1/57/5
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
भूरि॑ त इन्द्र वी॒र्यं१॒॑ तव॑ स्मस्य॒स्य स्तो॒तुर्म॑घव॒न्काम॒मा पृ॑ण। अनु॑ ते॒ द्यौर्बृ॑ह॒ती वी॒र्यं॑ मम इ॒यं च॑ ते पृथि॒वी ने॑म॒ ओज॑से ॥

भूरि॑ । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । वी॒र्य॑म् । तव॑ । स्म॒सि॒ । अ॒स्य । स्तो॒तुः । म॒घऽव॒न् । काम॑म् । आ । पृ॒ण॒ । अनु॑ । ते॒ । द्यौः । बृ॒ह॒ती । वी॒र्य॑म् । म॒मे॒ । इ॒यम् । च॒ । ते॒ । पृ॒थि॒वी । ने॒मे॒ । ओज॑से ॥

Mantra without Swara
भूरि त इन्द्र वीर्यं१ तव स्मस्यस्य स्तोतुर्मघवन्काममा पृण। अनु ते द्यौर्बृहती वीर्यं मम इयं च ते पृथिवी नेम ओजसे ॥

भूरि। ते। इन्द्र। वीर्यम्। तव। स्मसि। अस्य। स्तोतुः। मघऽवन्। कामम्। आ। पृण। अनु। ते। द्यौः। बृहती। वीर्यम्। ममे। इयम्। च। ते। पृथिवी। नेमे। ओजसे ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 22 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मघवन्) उत्तम धनयुक्त (इन्द्र) सेनादि बलवाले सभाध्यक्ष ! जिस (ते) आप का जो (भूरि) बहुत (वीर्यम्) पराक्रम है, जिस के हम लोग (स्मसि) आश्रित और जिस (तव) आपकी (इयम्) यह (बृहती) बड़ी (द्यौः) विद्या, विनययुक्त न्यायप्रकाश और राज्य के वास्ते (पृथिवी) भूमि (ओजसे) बलयुक्त के लिये और भोगने के लिये (नेमे) नम्र के समान है, वह आप (अस्य) इस (स्तोतुः) स्तुतिकर्त्ता के (कामम्) कामना को (आपृण) परिपूर्ण करें ॥ ५ ॥
Essence
मनुष्यों को योग्य है कि ईश्वर का आश्रय करके सब कामनाओं की सिद्धि वा पृथिवी के राज्य की प्राप्ति करके निरन्तर सुखी रहें ॥ ५ ॥
Subject
फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥