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Rigveda Mandal 1 / Sukta 56 / Mantra 5

191 Sukta
6 Mantra
1/56/5
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वि यत्ति॒रो ध॒रुण॒मच्यु॑तं॒ रजोऽति॑ष्ठिपो दि॒व आता॑सु ब॒र्हणा॑। स्व॑र्मीळ्हे॒ यन्मद॑ इन्द्र॒ हर्ष्याह॑न्वृ॒त्रं निर॒पामौ॑ब्जो अर्ण॒वम् ॥

वि । यत् । ति॒रः । ध॒रुण॑म् । अच्यु॑तम् । रजः॑ । अति॑स्थिपः । दि॒वः । आता॑सु । ब॒र्हणा॑ । स्वः॑ऽमीळ्हे । यत् । मदे॑ । इ॒न्द्र॒ । हर्ष्या॑ । अह॑न् । वृ॒त्रम् । निः । अ॒पाम् । औ॒ब्जः॒ । अ॒र्ण॒वम् ॥

Mantra without Swara
वि यत्तिरो धरुणमच्युतं रजोऽतिष्ठिपो दिव आतासु बर्हणा। स्वर्मीळ्हे यन्मद इन्द्र हर्ष्याहन्वृत्रं निरपामौब्जो अर्णवम् ॥

वि। यत्। तिरः। धरुणम्। अच्युतम्। रजः। अतिस्थिपः। दिवः। आतासु। बर्हणा। स्वःऽमीळ्हे। यत्। मदे। इन्द्र। हर्ष्या। अहन्। वृत्रम्। निः। अपाम्। औब्जः। अर्णवम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 21 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे परमैश्वर्य्ययुक्त (इन्द्र) सभेश ! जैसे (औब्जः) कोमल करनेवाले से सिद्ध हुआ (यत्) जो सूर्य (दिवः) प्रकाश वा आकर्षण से (आतासु) दिशाओं में (तिरः) तिरछा किया हुआ (बर्हणा) वृद्धियुक्त (अच्युतम्) कारणरूप वा प्रवाहरूप से अविनाशि (धरुणम्) आधारकर्त्ता (रजः) पृथिवी आदि सब लोकों को (व्यतिष्ठिपः) विशेष करके स्थापन करता और (मदे) आनन्दयुक्त (स्वर्मीढे) अन्तरिक्ष में वर्त्तमान (हर्ष्या) हर्ष उत्पन्न कराने योग्य कर्मों को करता हुआ (यत्) जिस (वृत्रम्) मेघ को (अहन्) नष्ट कर (आतासु) दिशाओं में (अपाम्) जलों के सकाश से (अर्णवम्) समुद्र को सिद्ध करता है, वैसे अपने राज्य और न्याय को धारण कर शत्रुओं को मार अपनी स्त्री को आनन्द दिया कर ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्यलोक अपने प्रकाश और आकर्षणादि गुणों से सब लोकों को अपनी-अपनी कक्षा में भ्रमण कराता, सब दिशाओं में अपना तेज वा रस को विस्तार और वर्षा को उत्पन्न करता हुआ प्रजा के पालन का हेतु होता है, वैसे स्त्री-पुरुषों को भी वर्त्तना चाहिये ॥ ५ ॥
Subject
फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥