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Rigveda Mandal 1 / Sukta 56 / Mantra 4

191 Sukta
6 Mantra
1/56/4
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
दे॒वी यदि॒ तवि॑षी॒ त्वावृ॑धो॒तय॒ इन्द्रं॒ सिष॑क्त्यु॒षसं॒ न सूर्यः॑। यो धृ॒ष्णुना॒ शव॑सा॒ बाध॑ते॒ तम॒ इय॑र्ति रे॒णुं बृ॒हद॑र्हरि॒ष्वणिः॑ ॥

दे॒वी । यदि॑ । तवि॑षी । त्वाऽवृ॑धा । ऊ॒तये॑ । इन्द्र॑म् । सिष॑क्ति । उ॒षस॑म् । न । सूर्यः॑ । यः । धृ॒ष्णुना॑ । शव॑सा । बाध॑ते । तमः॑ । इय॑र्ति । रे॒णुम् । बृ॒हत् । अ॒र्ह॒रि॒ऽस्वनिः॑ ॥

Mantra without Swara
देवी यदि तविषी त्वावृधोतय इन्द्रं सिषक्त्युषसं न सूर्यः। यो धृष्णुना शवसा बाधते तम इयर्ति रेणुं बृहदर्हरिष्वणिः ॥

देवी। यदि। तविषी। त्वाऽवृधा। ऊतये। इन्द्रम्। सिषक्ति। उषसम्। न। सूर्यः। यः। धृष्णुना। शवसा। बाधते। तमः। इयर्ति। रेणुम्। बृहत्। अर्हरिऽस्वनिः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 21 Mantra » 4

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Meaning
हे स्त्रि ! (यः) जो (अर्हरिष्वणिः) अहिंसक, धार्मिक और पापी लोगों का विवेककर्त्ता पुरुष (धृष्णुना) दृढ़ (शवसा) बल से (न) जैसे (सूर्य्यः) रवि (उषसम्) प्रातःसमय को प्राप्त हो के (बृहत्) बड़े (तमः) अन्धकार को दूर कर देता है, वैसे तेरे दुःख को दूर कर देता है। हे पुरुष ! (यदि) जो (त्वावृधा) तुझे सुख से बढ़ाने हारी (तविषी) पूर्ण बलयुक्त (देवी) विदुषी अतीव प्रिया स्त्री (रेणुम्) रमणीयस्वरूप तुझ को (इयर्त्ति) प्राप्त होती है और (ऊतये) रक्षादि के वास्ते (इन्द्रम्) परम सुखप्रद तुझे (सिषक्ति) उत्तम सुख से युक्त करती है, सो तू और वह स्त्री तुम दोनों एक-दूसरे के आनन्द के लिये सदा वर्त्ता करो ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जब स्त्री से प्रसन्न पुरुष और पुरुष से प्रसन्न स्त्री होवे, तभी गृहाश्रम में निरन्तर आनन्द होवे ॥ ४ ॥
Subject
फिर वे कैसे हों, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

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