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Rigveda Mandal 1 / Sukta 56 / Mantra 2

191 Sukta
6 Mantra
1/56/2
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
तं गू॒र्तयो॑ नेम॒न्निषः॒ परी॑णसः समु॒द्रं न सं॒चर॑णे सनि॒ष्यवः॑। पतिं॒ दक्ष॑स्य वि॒दथ॑स्य॒ नू सहो॑ गि॒रिं न वे॒ना अधि॑ रोह॒ तेज॑सा ॥

तम् । गू॒र्तयः॑ । ने॒म॒न्ऽइषः॑ । परी॑णसः । स॒मु॒द्रम् । न । स॒म्ऽचर॑णे । स॒नि॒ष्यवः॑ । पति॑म् । दक्ष॑स्य । वि॒दथ॑स्य । नु । सहाः । गि॒रिम् । न । वे॒नाः । अधि॑ । रो॒ह॒ । तेज॑सा ॥

Mantra without Swara
तं गूर्तयो नेमन्निषः परीणसः समुद्रं न संचरणे सनिष्यवः। पतिं दक्षस्य विदथस्य नू सहो गिरिं न वेना अधि रोह तेजसा ॥

तम्। गूर्तयः। नेमन्ऽइषः। परीणसः। समुद्रम्। न। सम्ऽचरणे। सनिष्यवः। पतिम्। दक्षस्य। विदथस्य। नु। सहः। गिरिम्। न। वेनाः। अधि। रोह। तेजसा ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 21 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे कन्ये ! तू (संचरणे) अच्छे प्रकार समागम में (न) जैसे (सनिष्यवः) सम्यक् विविध सेवन करनेहारी नदियाँ (समुद्रम्) सागर को प्राप्त होती और (न) जैसे बादल (गिरिम्) मेघ को प्राप्त होते हैं, वैसे जो (परीणसः) बहुत (नेमन्निषः) प्राप्त होने योग्य इष्ट सुखदायक (गूर्त्तयः) उद्यमयुक्त बुद्धिमती ब्रह्मचारिणी और (वेनाः) बुद्धिमान् ब्रह्मचारी लोग समावर्त्तन के पश्चात् परस्पर प्रीति के साथ विवाह करें (दक्षस्य) हे कन्ये ! तू सब विद्याओं में अतिचतुर (विदथस्य) पूर्णविद्यायुक्त विद्वान् से विद्या को प्राप्त हुए (पतिम्) स्वामी को (अधिरोह) प्राप्त हो (तेजसा) अतीव तेज से (तम्) उसको प्राप्त हो के (सहः) बल को (नु) शीघ्र प्राप्त हो ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। सब लड़के और लड़कियों को योग्य है कि यथोक्त ब्रह्मचर्य्य के सेवन से सम्पूर्ण विद्याओं को पढ़ के पूर्ण युवावस्था में अपने तुल्य, गुण कर्म और स्वभाववाले परस्पर परीक्षा करके अतीव प्रेम के साथ विवाह कर पुनः जो पूर्ण विद्यावाले हों तो लड़के लड़कियों को पढ़ाया करें, जो क्षत्रिय हों तो राजपालन और न्याय किया करें, जो वैश्य हों तो अपने वर्ण के कर्म और जो शूद्र हों तो अपने कर्म किया करें ॥ २ ॥
Subject
फिर वे कैसे हों, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥