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Rigveda Mandal 1 / Sukta 55 / Mantra 8

191 Sukta
8 Mantra
1/55/8
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अप्र॑क्षितं॒ वसु॑ बिभर्षि॒ हस्त॑यो॒रषा॑ळ्हं॒ सह॑स्त॒न्वि॑ श्रु॒तो द॑धे। आवृ॑तासोऽव॒तासो॒ न क॒र्तृभि॑स्त॒नूषु॑ ते॒ क्रत॑व इन्द्र॒ भूर॑यः ॥

अप्र॑ऽक्षितम् । वसु॑ । बि॒भ॒र्षि॒ । हस्त॑योः । अषा॑ळ्हम् । सहः॑ । त॒न्वि॑ । श्रु॒तः । द॒धे॒ । आऽवृ॑तासः । अ॒व॒तासः । न । क॒र्तृऽभिः॑ । त॒नूषु॑ । ते॒ । क्रत॑वः । इ॒न्द्र॒ । भूर॑यः ॥

Mantra without Swara
अप्रक्षितं वसु बिभर्षि हस्तयोरषाळ्हं सहस्तन्वि श्रुतो दधे। आवृतासोऽवतासो न कर्तृभिस्तनूषु ते क्रतव इन्द्र भूरयः ॥

अप्रऽक्षितम्। वसु। बिभर्षि। हस्तयोः। अषाळ्हम्। सहः। तन्वि। श्रुतः। दधे। आऽवृतासः। अवतासः। न। कर्तृऽभिः। तनूषु। ते। क्रतवः। इन्द्र। भूरयः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 20 Mantra » 3

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Meaning
हे (इन्द्र) सभाध्यक्ष ! (श्रुतः) प्रशंसायुक्त तू जिस (अप्रक्षितम्) क्षयरहित (वसु) धन और (अषाढम्) शत्रुओं से असह्य (सहः) बल को (तन्वि) शरीर में (हस्तयोः) हाथ में आँवले के फल के समान (बिभर्षि) धारण करता है, जो (आवृतासः) सुखों से युक्त (अवतासः) अच्छे प्रकार रक्षित मनुष्यों के (न) समान (ते) आपकी (भूरयः) बहुत शास्त्र विद्यायुक्त (क्रतवः) बुद्धि और कर्मों को (कर्त्तृभिः) पुरुषार्थी मनुष्य (तनूषु) शरीरों में धारण करते हैं, उनको मैं (दधे) धारण करता हूँ ॥ ८ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सभाध्यक्ष वा सभासद् विद्वान् लोग क्षयरहित विज्ञान, बल, धन, श्रवण और बहुत उत्तम कर्मों को धारण करते हैं, वैसे ही इन सब कामों को सब प्रजा के मनुष्यों को धारण करना चाहिये ॥ ८ ॥ ।इस सूक्त में सूर्य्य, प्रजा और सभाध्यक्ष के कृत्य का वर्णन किया है, इसी से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जानना चाहिये ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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