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Rigveda Mandal 1 / Sukta 55 / Mantra 7

191 Sukta
8 Mantra
1/55/7
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
दा॒नाय॒ मनः॑ सोमपावन्नस्तु ते॒ऽर्वाञ्चा॒ हरी॑ वन्दनश्रु॒दा कृ॑धि। यमि॑ष्ठासः॒ सार॑थयो॒ य इ॑न्द्र ते॒ न त्वा॒ केता॒ आ द॑भ्नुवन्ति॒ भूर्ण॑यः ॥

दा॒नाय॑ । मनः॑ । सो॒म॒ऽपा॒व॒न् । अ॒स्तु॒ । ते॒ । अ॒र्वाञ्चा॑ । हरी॒ इति॑ । व॒न्द॒न॒ऽश्रु॒त् । आ । कृ॒धि॒ । यमि॑ष्ठासः । सार॑थयः । ये । इ॒न्द्र्च । ते॒ । न । त्वा॒ । केताः॑ । आ । द॒भ्नु॒व॒न्ति॒ । भूर्ण॑यः ॥

Mantra without Swara
दानाय मनः सोमपावन्नस्तु तेऽर्वाञ्चा हरी वन्दनश्रुदा कृधि। यमिष्ठासः सारथयो य इन्द्र ते न त्वा केता आ दभ्नुवन्ति भूर्णयः ॥

दानाय। मनः। सोमऽपावन्। अस्तु। ते। अर्वाञ्चा। हरी इति। वन्दनऽश्रुत्। आ। कृधि। यमिष्ठासः। सारथयः। ये। इन्द्र। ते। न। त्वा। केताः। आ। दभ्नुवन्ति। भूर्णयः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 20 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वन्दनश्रुत्) स्तुति वा भाषण के सुनने-सुनाने और (सोमपावन्) श्रेष्ठ रसों के पीनेवाले (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त सभाध्यक्ष ! (ते) आपका (मनः) मन (दानाय) पुत्रों को विद्यादि दान के लिये (अस्तु) अच्छे प्रकार होवे, जैसे वायु वा सूर्य्य के (अर्वाञ्चा) वेगादि गुणों को प्राप्त करानेवाली (हरी) धारणाऽकर्षण गुण और जैसे (भूर्णयः) पोषक (यमिष्ठासः) अतिशय करके यमनकर्ता (सारथयः) रथों को चलानेवाले सारथि घोड़े आदि को सुशिक्षा कर नियम में रखते हैं, वैसे तू सब मनुष्यादि को धर्म में चला और सब में (केताः) शास्त्रीय प्रज्ञाओं को (आकृधि) अच्छे प्रकार प्राप्त कीजिये, इस प्रकार करने से (ये) जो तेरे शत्रु हैं वे (ते) तेरे वश में हो जायें, जिससे (त्वा) तुझ को (न दभ्नुवन्ति) दुःखित न कर सकें ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे उत्तम सारथि लोग घोड़े को अच्छे प्रकार शिक्षा करके नियम में चलाते हैं और जैसे तिरछा चलनेवाला वायु नियन्ता है, वैसे धार्मिक पढ़ाने और उपदेश करनेहारे विद्वान् लोग सत्य विद्या और सत्य उपदेशों से सबको सत्याचार में निश्चित करें, इन दोनों के विना मनुष्यों को धर्मात्मा करने के वास्ते कोई भी समर्थ नहीं हो सकता ॥ ७ ॥
Subject
फिर वह कैसा हो, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥