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Rigveda Mandal 1 / Sukta 55 / Mantra 6

191 Sukta
8 Mantra
1/55/6
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
स हि श्र॑व॒स्युः सद॑नानि कृ॒त्रिमा॑ क्ष्म॒या वृ॑धा॒न ओज॑सा विना॒शय॑न्। ज्योतीं॑षि कृ॒ण्वन्न॑वृ॒काणि॒ यज्य॒वेऽव॑ सु॒क्रतुः॒ सर्त॒वा अ॒पः सृ॑जत् ॥

सः । हि । श्र॒व॒स्युः । सद॑नानि । कृ॒त्रिमा॑ । क्ष्म॒या । वृ॒धा॒नः । ओज॑सा । वि॒ऽना॒शय॑न् । ज्योतीं॑षि । कृ॒ण्वन् । अ॒वृ॒काणि॑ । यज्य॑वे । अव॑ । सु॒ऽक्रतुः॑ । सर्त॒वै । अ॒पः । सृ॒ज॒त् ॥

Mantra without Swara
स हि श्रवस्युः सदनानि कृत्रिमा क्ष्मया वृधान ओजसा विनाशयन्। ज्योतींषि कृण्वन्नवृकाणि यज्यवेऽव सुक्रतुः सर्तवा अपः सृजत् ॥

सः। हि। श्रवस्युः। सदनानि। कृत्रिमा। क्ष्मया। वृधानः। ओजसा। विऽनाशयन्। ज्योतींषि। कृण्वन्। अवृकाणि। यज्यवे। अव। सुऽक्रतुः। सर्तवै। अपः। सृजत् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 20 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो (सुक्रतुः) श्रेष्ठ बुद्धि वा कर्मयुक्त (ओजसा) पराक्रम से (क्ष्मया) पृथिवी के साथ (वृधानः) बढ़ता हुआ और (श्रवस्युः) अपने आत्मा के वास्ते अन्न की इच्छा से सब शास्त्रों का श्रवण कराता हुआ (यज्यवे) राज्य के अनुष्ठान के वास्ते (सर्त्तवै) जाने-आने को (कृत्रिमाणि) किये हुए (अवृकाणि) चोरादि रहित (सदनानि) मार्ग और सुन्दर घरों को सुशोभित (कृण्वन्) करता हुआ (अपः) जलों को वर्षाने हारा (ज्योतींषि) चन्द्रादि नक्षत्रों को प्रकाशित करते हुए सूर्य्य के तुल्य (विनाशयन्) अविद्या का नाश करता हुआ राज्य (अवसृजत्) बनावे, वही सब मनुष्यों को माता, पिता, मित्र और रक्षक मानने योग्य है ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सब मनुष्य जो सूर्य्य के सदृश विद्या, धर्म और राजनीति का प्रचारकर्त्ता हो के सब मनुष्यों को उत्तम बोधयुक्त करता है, वह मनुष्यादि प्राणियों का कल्याणकारी है, ऐसा निश्चित जानें ॥ ६ ॥
Subject
फिर वह क्या करे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥