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Rigveda Mandal 1 / Sukta 55 / Mantra 5

191 Sukta
8 Mantra
1/55/5
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
स इन्म॒हानि॑ समि॒थानि॑ म॒ज्मना॑ कृ॒णोति॑ यु॒ध्म ओज॑सा॒ जने॑भ्यः। अधा॑ च॒न श्रद्द॑धति॒ त्विषी॑मत॒ इन्द्रा॑य॒ वज्रं॑ नि॒घनि॑घ्नते व॒धम् ॥

सः । इत् । म॒हानि॑ । स॒म्ऽइ॒थानि॑ । म॒ज्मना॑ । कृ॒णोति॑ । यु॒ध्मः । ओज॑सा । जने॑भ्यः । अध॑ । च॒न । श्रत् । द॒ध॒ति॒ । त्विषि॑ऽमते । इन्द्रा॑य । वज्र॑म् । नि॒ऽघनि॑घ्नते । व॒धम् ॥

Mantra without Swara
स इन्महानि समिथानि मज्मना कृणोति युध्म ओजसा जनेभ्यः। अधा चन श्रद्दधति त्विषीमत इन्द्राय वज्रं निघनिघ्नते वधम् ॥

सः। इत्। महानि। सम्ऽइथानि। मज्मना। कृणोति। युध्मः। ओजसा। जनेभ्यः। अध। चन। श्रत्। दधति। त्विषिऽमते। इन्द्राय। वज्रम्। निऽघनिघ्नते। वधम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 19 Mantra » 5

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Meaning
जो (सः) वह (युध्मः) युद्ध करनेवाला उपदेशक (मज्मना) बल वा (ओजसा) पराक्रम से युक्त हो के (जनेभ्यः) मनुष्यादिकों के सुख के लिये उपदेश से (महानि) बड़े पूजनीय (समिथानि) संग्रामों को जीतनेवाले के तुल्य अविद्या विजय को (कृणोति) करता है (वज्रम्) वज्रप्रहार के समान शत्रुओं के (वधम्) मारने को (निघनिघ्नते) मारनेवाले के समान आचरण करता है, तो (अध) इसके अनन्तर (इत्) ही (अस्मै) इस (त्विषीमते) प्रशंसनीय प्रकाशयुक्त (इन्द्राय) परमैश्वर्य्य की प्राप्ति करानेवाले के लिये सब मनुष्य लोग (चन) भी (श्रद्दधति) प्रीति से सत्य का धारण करते हैं ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य मेघ को उत्पन्न, काट और वर्षा करके अपने प्रकाश से सब मनुष्यों को आनन्दयुक्त करता है, वैसे ही अध्यापक और उपदेशक लोग विद्या को प्राप्त करा और अविद्या को जीत के अन्धपरम्परा को निवारण कर विद्यान्यायादि का प्रकाश करके सब प्रजा को सुखी करें ॥ ५ ॥
Subject
फिर वह कैसा हो, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

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