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Rigveda Mandal 1 / Sukta 54 / Mantra 9

191 Sukta
11 Mantra
1/54/9
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तुभ्येदे॒ते ब॑हु॒ला अद्रि॑दुग्धाश्चमू॒षद॑श्चम॒सा इ॑न्द्र॒पानाः॑। व्य॑श्नुहि त॒र्पया॒ काम॑मेषा॒मथा॒ मनो॑ वसु॒देया॑य कृष्व ॥

तुभ्य॑ । इत् । ए॒ते । ब॒हु॒लाः । अद्रि॑ऽदुग्धाः । च॒मू॒ऽसदः॑ । च॒म॒साः । इ॒न्द्र॒ऽपानाः॑ । वि । अ॒श्नु॒हि॒ । त॒र्पय॑ । काम॑म् । ए॒षा॒म् । अथ॑ । मनः॑ । व॒सु॒ऽदेया॑य । कृ॒ष्व॒ ॥

Mantra without Swara
तुभ्येदेते बहुला अद्रिदुग्धाश्चमूषदश्चमसा इन्द्रपानाः। व्यश्नुहि तर्पया काममेषामथा मनो वसुदेयाय कृष्व ॥

तुभ्य। इत्। एते। बहुलाः। अद्रिऽदुग्धाः। चमूऽसदः। चमसाः। इन्द्रऽपानाः। वि। अश्नुहि। तर्पय। कामम्। एषाम्। अथ। मनः। वसुऽदेयाय। कृष्व ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 18 Mantra » 4

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Meaning
हे (इन्द्र) सभाध्यक्ष ! जैसे (एते) ये (बहुलाः) बहुत सुख वा कर्मों को देनेवाले (इन्द्रपानाः) परमैश्वर्य के हेतु सूर्य्य को प्राप्त होने हारे (चमसा) मेघ सब कामों को पूर्ण करते हैं, वैसे (अद्रिदुग्धाः) मेघ वा पर्वतों से प्राप्तविद्या (चमूषदः) सेनाओं में स्थित शूरवीर पुरुष (तुभ्यम्) आपको तृप्त करें तथा आप इन को (वसुदेयाय) सुन्दर धन देने के लिये (मनः) मन (कृष्व) कीजिये और आप इन को (तर्पय) तृप्त वा (एषाम्) इन की (कामान्) कामना पूर्ण कीजिये (अथ) इस के अनन्तर (इत्) ही सब कामनाओं को (व्यश्नुहि) प्राप्त हूजिये ॥ ९ ॥
Essence
सभा आदि के अध्यक्ष उत्तम शिक्षा वा पालन से उत्पादन किये हुए शूरवीरों और प्रजा की निरन्तर पालना करके इनके लिये सब सुखों को देवें और वे प्रजा के पुरुष भी सभाध्यक्षादिकों को निरन्तर सन्तुष्ट रक्खें, जिससे सब कामना पूर्ण होवें ॥ ९ ॥
Subject
फिर वह क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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