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Rigveda Mandal 1 / Sukta 54 / Mantra 8

191 Sukta
11 Mantra
1/54/8
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अस॑मं क्ष॒त्रमस॑मा मनी॒षा प्र सो॑म॒पा अप॑सा सन्तु॒ नेमे॑। ये त॑ इन्द्र द॒दुषो॑ व॒र्धय॑न्ति॒ महि॑ क्ष॒त्रं स्थवि॑रं॒ वृष्ण्यं॑ च ॥

अस॑मम् । क्ष॒त्रम् । अस॑मा । म॒नी॒षा । प्र । सो॒म॒ऽपाः । अप॑सा । स॒न्तु॒ । नेमे॑ । ये । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । द॒दुषः॑ । व॒र्धय॑न्ति । महि॑ । क्ष॒त्रम् । स्थवि॑रम् । वृष्ण्य॑म् । च॒ ॥

Mantra without Swara
असमं क्षत्रमसमा मनीषा प्र सोमपा अपसा सन्तु नेमे। ये त इन्द्र ददुषो वर्धयन्ति महि क्षत्रं स्थविरं वृष्ण्यं च ॥

असमम्। क्षत्रम्। असमा। मनीषा। प्र। सोमऽपाः। अपसा। सन्तु। नेमे। ये। ते। इन्द्र। ददुषः। वर्धयन्ति। महि। क्षत्रम्। स्थविरम्। वृष्ण्यम्। च ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 18 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) सभाध्यक्ष ! जो (ददुषः) दान करते हुए (ते) आप का (असमम्) समता रहित कर्म वा सादृश्य रहित (क्षत्रम्) राज्य तथा (असमा) समता वा उपमा रहित (मनीषा) बुद्धि होवे तो (ये) जो (नेमे) सब (सोमपाः) सोम आदि ओषधीरसों के पीनेवाले धार्मिक विद्वान् पुरुष (अपसा) कर्म से (स्थविरम्) वृद्ध (वृष्ण्यम्) शत्रुओं के बलनाशक सुख वर्षानेवाले के लिये कल्याणकारक (महि) महागुणयुक्त (क्षत्रम्) राज्य को (प्रवर्धयन्ति) बढ़ाते हैं, वे सब आपकी सभा में बैठने योग्य सभासद् (च) और भृत्य (सन्तु) होवें ॥ ८ ॥
Essence
राजपुरुषों को प्रजा से और प्रजा में रहनेवाले पुरुषों को राजपुरुषों से विरोध कभी न करना चाहिये, किन्तु परस्पर प्रीति वा उपकार बुद्धि के साथ सब राज्य सुखों से बढ़ाना चाहिये, क्योंकि इस प्रकार किये विना राज्यपालन की व्यवस्था निश्चल नहीं हो सकती ॥ ८ ॥
Subject
फिर वह क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥