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Rigveda Mandal 1 / Sukta 54 / Mantra 7

191 Sukta
11 Mantra
1/54/7
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
स घा॒ राजा॒ सत्प॑तिः शूशुव॒ज्जनो॑ रा॒तह॑व्यः॒ प्रति॒ यः शास॒मिन्व॑ति। उ॒क्था वा॒ यो अ॑भिगृ॒णाति॒ राध॑सा॒ दानु॑रस्मा॒ उप॑रा पिन्वते दि॒वः ॥

सः । घ॒ । राजा॑ । सत्ऽप॑तिः । शू॒शु॒व॒त् । जनः॑ । रा॒तऽह॑व्यः । प्रति॑ । यः । शास॑म् । इन्व॑ति । उ॒क्था । वा॒ । यः । अ॒भि॒ऽगृ॒णाति॑ । राध॑सा । दानुः॑ । अ॒स्मै॒ । उप॑रा । पि॒न्व॒ते॒ । दि॒वः ॥

Mantra without Swara
स घा राजा सत्पतिः शूशुवज्जनो रातहव्यः प्रति यः शासमिन्वति। उक्था वा यो अभिगृणाति राधसा दानुरस्मा उपरा पिन्वते दिवः ॥

सः। घ। राजा। सत्ऽपतिः। शूशुवत्। जनः। रातऽहव्यः। प्रति। यः। शासम्। इन्वति। उक्था। वा। यः। अभिऽगृणाति। राधसा। दानुः। अस्मै। उपरा। पिन्वते। दिवः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 18 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो (रातहव्यः) हव्य पदार्थों को देने (सत्पतिः) सत्पुरुषों का पालन करने (जनः) उत्तम गुण और कर्मों से सहित वर्त्तमान (राजा) न्यायविनयादि गुणों से प्रकाशमान सभाध्यक्ष (प्रतिशासम्) शास्त्र-शास्त्र के प्रति प्रजा को (इन्वति) न्याय में व्याप्त करता (वा) अथवा (शूशुवत्) राज्य करने को जानता है और जो (राधसा) न्याय करके प्राप्त हुए धन से (दानुः) दानशील हुआ (उक्था) कहने योग्य वेदस्तोत्र वा वचनों को (अभिगृणाति) सब मनुष्यों के लिये उपदेश करता है (अस्मै) इस सभाध्यक्ष के लिये (दिवः) (उपरा) जैसे सूर्य के प्रकाश से मेघ उत्पन्न होकर भूमि को (पिन्वते) सींचता है, वैसे सब सुखों को (पिन्वते) सेवन करे (सः) वही राज्य कर सकता है ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। कोई भी मनुष्य उत्तम विद्या, विनय, न्याय और वीरपुरुषों की सेना के ग्रहण वा अनुष्ठान के विना राज्य के लिये शिक्षा करने, शत्रुओं को जीतने और सब सुखों को प्राप्त होने को समर्थ नहीं हो सकता, इसलिये सभाध्यक्ष को अवश्य इन बातों का अनुष्ठान करना चाहिये ॥ ७ ॥
Subject
फिर उस सभाध्यक्ष को क्या करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥