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Rigveda Mandal 1 / Sukta 54 / Mantra 5

191 Sukta
11 Mantra
1/54/5
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
नि यद्वृ॒णक्षि॑ श्वस॒नस्य॑ मू॒र्धनि॒ शुष्ण॑स्य चिद्व्र॒न्दिनो॒ रोरु॑व॒द्वना॑। प्रा॒चीने॑न॒ मन॑सा ब॒र्हणा॑वता॒ यद॒द्या चि॑त्कृ॒णवः॒ कस्त्वा॒ परि॑ ॥

नि । यत् । वृ॒णक्षि॑ । श्व॒स॒नस्य॑ । मू॒र्धनि॑ । शुष्ण॑स्य । चि॒त् । व्र॒न्दिनः॑ । रोरु॑वत् । वना॑ । प्रा॒चीने॑न । मन॑सा । ब॒र्हणा॑ऽवता । यत् । अ॒द्य । चि॒त् । कृ॒णवः॑ । कः । त्वा॒ । परि॑ ॥

Mantra without Swara
नि यद्वृणक्षि श्वसनस्य मूर्धनि शुष्णस्य चिद्व्रन्दिनो रोरुवद्वना। प्राचीनेन मनसा बर्हणावता यदद्या चित्कृणवः कस्त्वा परि ॥

नि। यत्। वृणक्षि। श्वसनस्य। मूर्धनि। शुष्णस्य। चित्। व्रन्दिनः। रोरुवत्। वना। प्राचीनेन। मनसा। बर्हणाऽवता। यत्। अद्य। चित्। कृणवः। कः। त्वा। परि ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 17 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे सभाध्यक्ष विद्वान् ! (यत्) जो आप जैसे सविता (वना) रश्मियुक्त मेघ का निवारण करता है, वैसे (प्राचीनेन) सनातन (बर्हणावता) अनेक प्रकार वृद्धियुक्त (मनसा) विज्ञान से (श्वसनस्य) प्राणवद् बलवान् (शुष्णस्य) शोषणकर्त्ता के (मूर्द्धनि) उत्तम अङ्ग में प्रहार के (चित्) समान (व्रन्दिनः) निन्दित कर्म करनेवाले दुष्ट मनुष्यों को (रोरुवत्) रोदन कराते हुए (यत्) जिस कारण (अद्य) आज (निवृणक्षि) निरन्तर उन दुष्टों को अलग करते हो, इससे (चित्) भी (त्वा) आप के (कृणवः) मारने को (कः) कोई भी समर्थ (परि) नहीं हो सकता ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलु्प्तोपमालङ्कार है। जैसे परमेश्वर अपने अनादि विज्ञान युक्त न्याय से सबको शिक्षा देता और सूर्य मेघ को काट-काट कर गिराता है, वैसे ही सभापति आदि धर्म से सब की शिक्षा देवें और शत्रुओं को नष्ट-भ्रष्ट करें ॥ ५ ॥
Subject
फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥