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Rigveda Mandal 1 / Sukta 54 / Mantra 4

191 Sukta
11 Mantra
1/54/4
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
त्वं दि॒वो बृ॑ह॒तः सानु॑ कोप॒योऽव॒ त्मना॑ धृष॒ता शम्ब॑रं भिनत्। यन्मा॒यिनो॑ व्र॒न्दिनो॑ म॒न्दिना॑ धृ॒षच्छि॒तां गभ॑स्तिम॒शनिं॑ पृत॒न्यसि॑ ॥

त्वम् । दि॒वः । बृ॒ह॒तः । सानु॑ । को॒प॒यः॒ । अव॑ । त्मना॑ । धृ॒ष॒ता । शम्ब॑रम् । भि॒न॒त् । यत् । मा॒यिनः॑ । व्र॒न्दिनः॑ । म॒न्दिना॑ । धृ॒षत् । शि॒ताम् । गभ॑स्तिम् । अ॒शनि॑म् । पृ॒त॒न्यसि॑ ॥

Mantra without Swara
त्वं दिवो बृहतः सानु कोपयोऽव त्मना धृषता शम्बरं भिनत्। यन्मायिनो व्रन्दिनो मन्दिना धृषच्छितां गभस्तिमशनिं पृतन्यसि ॥

त्वम्। दिवः। बृहतः। सानु। कोपयः। अव। त्मना। धृषता। शम्बरम्। भिनत्। यत्। मायिनः। व्रन्दिनः। मन्दिना। धृषत्। शिताम्। गभस्तिम्। अशनिम्। पृतन्यसि ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 17 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे सभाध्यक्ष ! जो (धृषत्) शत्रुओं का धर्षण करता (त्वम्) आप जैसे सूर्य्य (बृहतः) महासत्य शुभगुणयुक्त (दिवः) प्रकाश से (सानु) सेवने योग्य मेघ के शिखरों पर (शिताम्) अति तीक्ष्ण (अशनिम्) छेदन-भेदन करने से वज्रस्वरूप बिजुली और (गभस्तिम्) वज्ररूप किरणों का प्रहार कर (शम्बरम्) मेघ को (भिनत्) काट के भूमि में गिरा देता है, वैसे शस्त्र और अस्त्रों को चला के अपने (त्मना) आत्मा से दुष्ट मनुष्यों को (अवकोपयः) कोप कराते (व्रन्दिनः) निन्दित मनुष्यादि समूहोंवाले (मायिनः) कपटादि दोषयुक्त शत्रुओं को विदीर्ण करते और उनके निवारण के लिये (पृतन्यसि) अपने न्यायादि गुणों की प्रकाश करनेवाली विद्या वा वीर पुरुषों से युक्त सेना की इच्छा करते हो, सो आप राज्य के योग्य होते हो ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जगदीश्वर पापकर्म करनेवाले मनुष्यों के लिये अपने-अपने पाप के अनुसार दुःख के फलों को देकर यथायोग्य पीड़ा देता है, इसी प्रकार सभाध्यक्ष को चाहिये कि शस्त्रों और अस्त्रों की शिक्षा से धार्मिक शूरवीर पुरुषों की सेना को सिद्ध और दुष्ट कर्म करनेवाले मनुष्यों का निवारण करके धर्मयुक्त प्रजा का निरन्तर पालन करे ॥ ४ ॥
Subject
फिर वह सभाध्यक्ष कैसा होवे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥