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Rigveda Mandal 1 / Sukta 54 / Mantra 11

191 Sukta
11 Mantra
1/54/11
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स शेवृ॑ध॒मधि॑ धा द्यु॒म्नम॒स्मे महि॑ क्ष॒त्रं ज॑ना॒षाळि॑न्द्र॒ तव्य॑म्। रक्षा॑ च नो म॒घोनः॑ पा॒हि सू॒रीन्रा॒ये च॑ नः स्वप॒त्या इ॒षे धाः॑ ॥

सः । शेऽवृ॑धम् । अधि॑ । धाः॒ । द्यु॒म्नम् । अ॒स्मे इति॑ । महि॑ । क्ष॒त्रम् । ज॒ना॒षाट् । इ॒न्द्र॒ । तव्य॑म् । रक्ष॑ । च॒ । नः॒ । म॒घोनः॑ । पा॒हि । सू॒रीन् । रा॒ये । च॒ । नः॒ । सु॒ऽअ॒प॒त्यै । इ॒षे । धाः॒ ॥

Mantra without Swara
स शेवृधमधि धा द्युम्नमस्मे महि क्षत्रं जनाषाळिन्द्र तव्यम्। रक्षा च नो मघोनः पाहि सूरीन्राये च नः स्वपत्या इषे धाः ॥

सः। शेऽवृधम्। अधि। धाः। द्युम्नम्। अस्मे इति। महि। क्षत्रम्। जनाषाट्। इन्द्र। तव्यम्। रक्ष। च। नः। मघोनः। पाहि। सूरीन्। राये। च। नः। सुऽअपत्यै। इषे। धाः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 18 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) परमैश्वर्य्यसम्पादक सभाध्यक्ष ! जो (जनाषाट्) जनों को सहन करने हारे आप (अस्मे) हम लोगों के लिये (शेवृधम्) सुख (तव्यम्) बलयुक्त (महि) महासुखदायक पूजनीय (क्षत्रम्) राज्य को (अधि) (धाः) अच्छे प्रकार सर्वोपरि धारण कर (मघोनः) प्रशंसनीय धन वा (नः) हम लोगों की (रक्ष) रक्षा (च) और (सूरीन्) बुद्धिमान् विद्वानों की (पाहि) रक्षा कीजिये (च) और (नः) हम लोगों के (राये) धन (च) और (स्वपत्यै) उत्तम अपत्ययुक्त (इषे) इष्टरूप राजलक्ष्मी के लिये (द्युम्नम्) कीर्त्तिकारक धन को (धाः) धारण करते हो (सः) वह आप हम लोगों से सत्कार योग्य क्यों न होवें ॥ ११ ॥
Essence
सभाध्यक्ष को योग्य है कि सब प्रजा की अच्छे प्रकार रक्षा करके और शिक्षा से युक्त विद्वान् करके चक्रवर्त्ती राज्य वा धन की उन्नति करे ॥ ११ ॥ इस सूक्त में सूर्य्य, बिजुली, सभाध्यक्ष, शूरवीर और राज्य की पालना आदि का विधान किया है, इससे इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥
Subject
फिर सभा आदि के अध्यक्षों के कृत्य का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥