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Rigveda Mandal 1 / Sukta 53 / Mantra 8

191 Sukta
11 Mantra
1/53/8
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वं कर॑ञ्जमु॒त प॒र्णयं॑ वधी॒स्तेजि॑ष्ठयातिथि॒ग्वस्य॑ वर्त॒नी। त्वं श॒ता वङ्गृ॑दस्याभिन॒त्पुरो॑ऽनानु॒दः परि॑षूता ऋ॒जिश्व॑ना ॥

त्वम् । कर॑ञ्जम् । उ॒त । प॒र्णय॑म् । व॒धीः॒ । तेजि॑ष्ठया । अ॒ति॒थि॒ऽग्वस्य॑ । व॒र्त॒नी । त्वम् । श॒ता । वङ्गृ॑दस्य । अ॒भि॒न॒त् । पुरः॑ । अ॒न॒नु॒ऽदः । परि॑ऽसूताः । ऋ॒जिश्व॑ना ॥

Mantra without Swara
त्वं करञ्जमुत पर्णयं वधीस्तेजिष्ठयातिथिग्वस्य वर्तनी। त्वं शता वङ्गृदस्याभिनत्पुरोऽनानुदः परिषूता ऋजिश्वना ॥

त्वम्। करञ्जम्। उत। पर्णयम्। वधीः। तेजिष्ठया। अतिथिऽग्वस्य। वर्तनी। त्वम्। शता। वङ्गृदस्य। अभिनत्। पुरः। अननुऽदः। परिऽसूताः। ऋजिश्वना ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 16 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे सभाध्यक्ष ! जिस कारण (त्वम्) आप इस युद्धव्यवहार में (तेजिष्ठया) अत्यन्त तीक्ष्ण सेना वा नीतियुक्त बल से (करञ्जम्) धार्मिकों को दुःख देने (पर्णयम्) दूसरे के वस्तु को लेनेवाले चोर को (उत) भी (वधीः) मारते और जो (अतिथिग्वस्य) अतिथियों के जाने आने के वास्ते (वर्तनी) सत्कार करनेवाली क्रिया है, उसकी रक्षा कर (अननुदः) अनुकूल न वर्त्तने (वङ्गृदस्य) जहर आदि पदार्थों को देने वा दुष्ट व्यवहारों का उपदेश करनेवाले दुष्ट मनुष्य के (शता) असंख्यात (पुरः) नगरों को (अभिनत्) भेदन करते और जो (परिसूताः) सब प्रकार से उत्पन्न किये हुए पदार्थ हैं, उनकी (ऋजिश्वना) कोमल गुणयुक्त कुत्तों की शिक्षा करनेवाले के समान व्यवहार के साथ रक्षा करते हो, इससे आप ही सभा आदि के अध्यक्ष होने योग्य हो, ऐसा हम लोग निश्चय करते हैं ॥ ८ ॥
Essence
राजमनुष्यों को दुष्ट शत्रुओं के छेदन से पूर्ण विद्यायुक्त परोपकारी धार्मिक अतिथियों के सत्कार के लिये सब प्राणी वा सब पदार्थों की रक्षा करके धर्मयुक्त राज्य का सेवन करना चाहिये, जैसे कि कुत्ते अपनी स्वामी की रक्षा करते हैं, वैसी अन्य जन्तु रक्षा नहीं कर सकते, इससे इन कुत्तों को सिखा कर और इनकी रक्षा करनी चाहिये ॥ ८ ॥
Subject
फिर वह क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥