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Rigveda Mandal 1 / Sukta 53 / Mantra 7

191 Sukta
11 Mantra
1/53/7
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
यु॒धा युध॒मुप॒ घेदे॑षि धृष्णु॒या पु॒रा पुरं॒ समि॒दं हं॒स्योज॑सा। नम्या॒ यदि॑न्द्र॒ सख्या॑ परा॒वति॑ निब॒र्हयो॒ नमु॑चिं॒ नाम॑ मा॒यिन॑म् ॥

यु॒धा । युध॑म् । उप॑ । घ॒ । इत् । ए॒षि॒ । धृ॒श्णु॒ऽया । पु॒रा । पुर॑म् । सम् । इ॒दम् । हं॒सि॒ । ओज॑सा । नम्या॑ । यत् । इ॒न्द्र॒ । सख्या॑ । प॒रा॒ऽवति॑ । नि॒ऽब॒र्हयः॑ । नमु॑च्म् । नाम॑ । मा॒यिन॑म् ॥

Mantra without Swara
युधा युधमुप घेदेषि धृष्णुया पुरा पुरं समिदं हंस्योजसा। नम्या यदिन्द्र सख्या परावति निबर्हयो नमुचिं नाम मायिनम् ॥

युधा। युधम्। उप। घ। इत्। एषि। धृष्णुऽया। पुरा। पुरम्। सम्। इदम्। हंसि। ओजसा। नम्या। यत्। इन्द्र। सख्या। पराऽवति। निऽबर्हयः। नमुचिम्। नाम। मायिनम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 16 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) सभासेनाध्यक्ष ! (यत्) जिस कारण तुम (धृष्णुया) दृढ़ता आदि गुणयुक्त (सख्या) मित्रसमूह (युधा) युद्ध करनेवाले (ओजसा) बल के साथ (पुरा) पहिले (इदम्) इस (पुरम्) शत्रुओं के नगर को (हंसि) नष्ट करते तथा (युधम्) युद्ध करते हुए शत्रु को (इत्) भी (घ) निश्चय करके (एषि) प्राप्त करते और (नम्या) जैसे रात्रि अन्धकार से सब पदार्थों का आवरण करती है, वैसे अन्याय से अन्धकार करनेवाले (नाम) प्रसिद्ध (नमुचिम्) छुट्टी से रहित (मायिनम्) छल-कपटयुक्त दुष्ट कर्म करनेवाले मनुष्य वा पश्वादि को (परावति) दूर देश में (निबर्हयः) निःसारण करते हो, इससे आपको मूर्द्धाभिषिक्त करके हम लोग सभाध्यक्ष के अधिकार में स्वीकार करके राजपदवी से मान्य करते हैं ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि बहुत उत्तम-उत्तम मित्रों को प्राप्त, दुष्ट शत्रुओं का निवारण, दुष्ट दल वा शत्रुओं के पुरों को विदारण, सब अन्यायकारी मनुष्यों को निरन्तर कैदघर में बाँध, ताड़ना दे और धर्मयुक्त चक्रवर्त्ति राज्य को पालन करके उत्तम ऐश्वर्य को सिद्ध करें ॥ ७ ॥
Subject
फिर वह सेनाध्यक्ष कैसा होवे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥