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Rigveda Mandal 1 / Sukta 53 / Mantra 4

191 Sukta
11 Mantra
1/53/4
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
ए॒भिर्द्युभिः॑ सु॒मना॑ ए॒भिरिन्दु॑भिर्निरुन्धा॒नो अम॑तिं॒ गोभि॑र॒श्विना॑। इन्द्रे॑ण॒ दस्युं॑ द॒रय॑न्त॒ इन्दु॑भिर्यु॒तद्वे॑षसः॒ समि॒षा र॑भेमहि ॥

ए॒भिः । द्युभिः॑ । सु॒ऽमनाः॑ । ए॒भिः । इन्दु॑ऽभिः । निः॒ऽउ॒न्धा॒नः । अम॑तिम् । गोभिः॑ । अ॒श्विना॑ । इन्द्रे॑ण । दस्यु॑म् । द॒रय॑न्तः । इन्दु॑ऽभिः । यु॒तऽद्वे॑षसः । सम् इ॒षा । र॒भे॒म॒हि॒ ॥

Mantra without Swara
एभिर्द्युभिः सुमना एभिरिन्दुभिर्निरुन्धानो अमतिं गोभिरश्विना। इन्द्रेण दस्युं दरयन्त इन्दुभिर्युतद्वेषसः समिषा रभेमहि ॥

एभिः। द्युभिः। सुऽमनाः। एभिः। इन्दुऽभिः। निःऽउन्धानः। अमतिम्। गोभिः। अश्विना। इन्द्रेण। दस्युम्। दरयन्तः। इन्दुऽभिः। युतऽद्वेषसः। सम् इषा। रभेमहि ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 15 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हम लोग जो (अमतिम्) विज्ञान वा सुख से अविद्या दरिद्रता तथा सुन्दर रूप को (निरुन्धानः) निरोध वा ग्रहण करता हुआ (सुमनाः) उत्तम विज्ञानयुक्त सभाध्यक्ष है, उसकी प्राप्ति कर उसके सहाय वा (एभिः) इन (द्युभिः) प्रकाशयुक्त द्रव्य (एभिः) इन (इन्दुभिः) आह्लादकारक गुण वा पदार्थ इन (गोभिः) प्रशंसनीय गौ पृथिवी (अश्विना) अग्नि, जल, सूर्य्य, चन्द्र आदि (इषा) इच्छा वा अन्नादि (इन्दुभिः) सोमरसादि पेयों (इन्द्रेण) बिजुली और उसके रचे हुए विदारण करनेवाले शस्त्र से (दस्युम्) बल से दूसरे के धन को लेनेवाले दुष्ट को (दरयन्तः) विदारण करते हुए (युतद्वेषसः) द्वेष से अलग होनेवाले शत्रुओं के साथ युद्ध को सुख से (समारभेमहि) आरम्भ करें ॥ ४ ॥
Essence
जो सभाध्यक्ष सब विद्याओं की शिक्षा कर हम लोगों को सुखी करता है, उसका सब मनुष्यों को सेवन करना चाहिये । इस के सहाय के विना कोई भी मनुष्य व्यावहारिक और परमार्थविषयक आनन्द को प्राप्त होने को समर्थ नहीं हो सकता, इससे इसके सहाय से सब धर्मयुक्त कार्यों का आरम्भ वा सुख का सेवन करना चाहिये ॥ ४ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥