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Rigveda Mandal 1 / Sukta 53 / Mantra 3

191 Sukta
11 Mantra
1/53/3
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
शची॑व इन्द्र पुरुकृद्द्युमत्तम॒ तवेदि॒दम॒भित॑श्चेकिते॒ वसु॑। अतः॑ सं॒गृभ्या॑भिभूत॒ आ भ॑र॒ मा त्वा॑य॒तो ज॑रि॒तुः काम॑मूनयीः ॥

शची॑ऽवः । इ॒न्द्र॒ । पु॒रु॒ऽकृ॒त् । द्यु॒म॒त्ऽत॒म॒ । तव॑ । इत् । इ॒दम् । अ॒भितः॑ । चे॒कि॒ते॒ । वसु॑ । अतः॑ । स॒म्ऽगृभ्य॑ । अ॒भि॒ऽभू॒ते॒ । आ । भ॒र॒ । मा । त्वा॒ऽय॒तः । ज॒रि॒तुः । काम॑म् । ऊ॒न॒यीः॒ ॥

Mantra without Swara
शचीव इन्द्र पुरुकृद्द्युमत्तम तवेदिदमभितश्चेकिते वसु। अतः संगृभ्याभिभूत आ भर मा त्वायतो जरितुः काममूनयीः ॥

शचीऽवः। इन्द्र। पुरुऽकृत्। द्युमत्ऽतम। तव। इत्। इदम्। अभितः। चेकिते। वसु। अतः। सम्ऽगृभ्य। अभिऽभूते। आ। भर। मा। त्वाऽयतः। जरितुः। कामम्। ऊनयीः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 15 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शचीवः) प्रशंसनीय प्रज्ञा, वाणी और कर्मयुक्त (द्युमत्तम) अतिशय करके सर्वज्ञता विद्याप्रकाशयुक्त (पुरुकृत्) बहुत सुखों के दाता (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त जगदीश्वर वा एैश्वर्यप्रापक सभापति विद्वान् ! आपकी कृपा वा आप के सहाय से मनुष्य (अभितः) सब ओर से (इदम्) इस (वसु) उत्तम धन को (चेकिते) जानता है, हे (अभिभूते) शत्रुओं के पराजय करनेवाले ! जिस कारण आप (त्वायतः) आप वा उस के आत्मा की इच्छा करते हुए (जरितुः) स्तुति करनेवाले धार्मिक भक्तजन की (कामम्) इष्टसिद्धि को (आभर) पूर्ण करें (अतः) इस पुरुषार्थ से आपको (संगृभ्य) ग्रहण करके मैं वर्त्तता हूँ और आप मुझे सब कामों से पूर्ण कीजिये, आपकी इच्छा करते हुए स्तुति करनेवाले मेरी इष्टसिद्धि को (मोनयीः) कभी क्षीण मत कीजिये ॥ ३ ॥
Essence
निश्चय ही मनुष्यों को परमेश्वर वा विद्वान् मनुष्य के संग के विना कोई भी इष्टसिद्धियों को पूरण कर सकनेवाला नहीं है। इससे इसी की उपासना वा विद्वान् मनुष्य का सत्संग करके इष्टसिद्धि को सम्पादन करना चाहिये ॥ ३ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में उपदेश किया है ॥