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Rigveda Mandal 1 / Sukta 53 / Mantra 2

191 Sukta
11 Mantra
1/53/2
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- भुरिग्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
दु॒रो अश्व॑स्य दु॒र इ॑न्द्र॒ गोर॑सि दु॒रो यव॑स्य॒ वसु॑न इ॒नस्पतिः॑। शि॒क्षा॒न॒रः प्र॒दिवो॒ अका॑मकर्शनः॒ सखा॒ सखि॑भ्य॒स्तमि॒दं गृ॑णीमसि ॥

दु॒रः । अश्व॑स्य । दु॒रः । इ॒न्द्र॒ । गोः । अ॒सि॒ । दु॒रः । यव॑स्य । वसु॑नः । इ॒नः । पतिः॑ । शि॒क्षा॒ऽन॒रः । प्र॒ऽदिवः॑ । अका॑मऽकर्शनः । सखा॑ । सखि॑ऽभ्यः । तम् । इ॒दम् । गृ॒णी॒म॒सि॒ ॥

Mantra without Swara
दुरो अश्वस्य दुर इन्द्र गोरसि दुरो यवस्य वसुन इनस्पतिः। शिक्षानरः प्रदिवो अकामकर्शनः सखा सखिभ्यस्तमिदं गृणीमसि ॥

दुरः। अश्वस्य। दुरः। इन्द्र। गोः। असि। दुरः। यवस्य। वसुनः। इनः। पतिः। शिक्षाऽनरः। प्रऽदिवः। अकामऽकर्शनः। सखा। सखिऽभ्यः। तम्। इदम्। गृणीमसि ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 15 Mantra » 2

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Meaning
हे (इन्द्र) विद्वन् ! जो (अकामकर्शनः) आलस्ययुक्त मनुष्यों को कृश करनेवाले (शिक्षानरः) शिक्षाओं को प्राप्त करने वा (सखिभ्यः) मित्रों के (सखा) मित्र (पतिः) पालन करने वा (इनः) ईश्वर के तुल्य सामर्थ्ययुक्त आप (अश्वस्य) व्याप्तिकारक अग्नि आदि वा तुरङ्ग आदि के (दुरः) द्वारों को प्राप्त होके सुख देनेवाली (गोः) वाणी वा दूध देनेवाली गौ के (दुरः) सुख देनेवाले द्वारों को जान (यवस्य) उत्तम यव आदि अन्न (प्रदिवः) उत्तम विज्ञान प्रकाश और (वसुनः) उत्तम धन देनेवाले (असि) हैं (तम्) उस आपकी (इदम्) पूजा वा सत्कारपूर्वक (गृणीमसि) स्तुति करते हैं ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। परमेश्वर के तुल्य धार्मिक विद्वान् के विना किसी के लिये सब पदार्थ वा सब सुखों के देनेवाला कोई नहीं है, परन्तु जो निश्चय करके सबके मित्र शिक्षाओं को प्राप्त किये हुए आलस्य को छोड़कर, ईश्वर की उपासना विद्या वा विद्वानों के संग को प्रीति से सेवन करनेवाले मनुष्य हैं, वे ही इन सब सुखों को प्राप्त होते हैं, आलसी मनुष्य नहीं ॥ २ ॥
Subject
अब अगले मन्त्र में विद्वानों के गुणों का उपदेश किया है ॥

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