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Rigveda Mandal 1 / Sukta 52 / Mantra 8

191 Sukta
15 Mantra
1/52/8
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ज॒घ॒न्वाँ उ॒ हरि॑भिः संभृतक्रत॒विन्द्र॑ वृ॒त्रं मनु॑षे गातु॒यन्न॒पः। अय॑च्छथा बा॒ह्वोर्वज्र॑माय॒समधा॑रयो दि॒व्या सूर्यं॑ दृ॒शे ॥

ज॒घ॒न्वान् । ऊँ॒ इति॑ । हरि॑ऽभिः । स॒म्भृ॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ सम्भृतऽक्रतो । इन्द्र॑ । वृ॒त्रम् । मनु॑षे । गा॒तु॒ऽयन् । अ॒पः । अय॑च्छथाः । बा॒ह्वोः । वज्र॑म् । आ॒य॒सम् । अधा॑रयः । दि॒वि । आ । सूर्य॑म् । दृ॒शे ॥

Mantra without Swara
जघन्वाँ उ हरिभिः संभृतक्रतविन्द्र वृत्रं मनुषे गातुयन्नपः। अयच्छथा बाह्वोर्वज्रमायसमधारयो दिव्या सूर्यं दृशे ॥

जघन्वान्। ऊँ इति। हरिऽभिः। सम्भृतक्रतो इति सम्भृतऽक्रतो। इन्द्र। वृत्रम्। मनुषे। गातुऽयन्। अपः। अयच्छथाः। बाह्वोः। वज्रम्। आयसम्। अधारयः। दिवि। आ। सूर्यम्। दृशे ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 13 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (संभृतक्रतो) क्रियाप्रज्ञाओं को धारण किये हुए (इन्द्र) मेघावयवों का छेदन करनेवाले सूर्य्य के समान शत्रुओं को ताड़नेवाले सभापति ! आप जैसे सूर्य अपने किरणों से (वृत्रम्) मेघ को (जघन्वान्) गिराता हुआ (आपः) जलों को (मनुषे) मनुष्यों को (गातुयन्) पृथिवी पर प्राप्त करता हुआ प्रजा को धारण करता है, वैसे ही प्रजा की रक्षा के लिये (बाह्वोः) बल तथा आकर्षणों के समान भुजाओं के मध्य (आयसम्) लोहे के (वज्रम्) किरणसमूह के तुल्य शस्त्रों को (आधारयः) अच्छे प्रकार धारण कीजिये, वीरों को कराइये और सब मनुष्यों को सुख होने के लिये (दिवि) शुद्ध व्यवहार में (सूर्य्यम्) सूर्यमण्डल के समान न्याय और विद्या के प्रकाश को (दृशे) दिखाने के लिये (अयच्छथाः) सब प्रकार से प्रदान कीजिये ॥ ८ ॥
Essence
जैसे सूर्यलोक बल और आकर्षण गुणों से सब लोकों के धारण से जल को आकर्षण कर वर्षा से दिव्य सुखों को उत्पन्न करता है, वैसे ही सभा सब गुणों को धर, धनकार्य्य से सुपात्रों को सुमार्ग की प्रवृत्ति के लिये दान देकर प्रजा के लिये आनन्द को प्रकट करे ॥ ८ ॥
Subject
फिर वह कैसा हो, यह विषय उपदेश अगले मन्त्र में कहा है ॥