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Rigveda Mandal 1 / Sukta 52 / Mantra 7

191 Sukta
15 Mantra
1/52/7
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ह्र॒दं न हि त्वा॑ न्यृ॒षन्त्यू॒र्मयो॒ ब्रह्मा॑णीन्द्र॒ तव॒ यानि॒ वर्ध॑ना। त्वष्टा॑ चित्ते॒ युज्यं॑ वावृधे॒ शव॑स्त॒तक्ष॒ वज्र॑म॒भिभू॑त्योजसम् ॥

ह्र॒दम् । न । हि । त्वा॒ । नि॒ऽऋ॒षन्ति॑ । ऊ॒र्मयः॑ । ब्रह्मा॑णि । इ॒न्द्र॒ । तव॑ । यानि॑ । वर्ध॑ना । त्वष्टा॑ । चि॒त् । ते॒ । युज्य॑म् । व॒वृ॒धे॒ । शवः॑ । त॒तक्ष॑ । वज्र॑म् । अ॒भिभू॑तिऽओजसम् ॥

Mantra without Swara
ह्रदं न हि त्वा न्यृषन्त्यूर्मयो ब्रह्माणीन्द्र तव यानि वर्धना। त्वष्टा चित्ते युज्यं वावृधे शवस्ततक्ष वज्रमभिभूत्योजसम् ॥

ह्रदम्। न। हि। त्वा। निऽऋषन्ति। ऊर्मयः। ब्रह्माणि। इन्द्र। तव। यानि। वर्धना। त्वष्टा। चित्। ते। युज्यम्। ववृधे। शवः। ततक्ष। वज्रम्। अभिभूतिऽओजसम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 13 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) बिजुली के समान वर्त्तमान (ते) आपके (वर्द्धना) बढ़ानेहारे (ब्रह्माणि) बड़े-बड़े अन्न (ऊर्मयः) तरंग आदि (ह्रदम्) (न) जैसे नदी जलस्थान को प्राप्त होती हैं, वैसे (हि) निश्चय करके ज्योतियों को (न्यृषन्ति) प्राप्त होते हैं, वह (त्वष्टा) मेघाऽवयव वा मूर्तिमान् द्रव्यों का छेदन करनेवाले (शवः) बल (अभिभूत्योजसम्) ऐश्वर्ययुक्त पराक्रम तथा (युज्यम्) युक्त करने योग्य (वज्रम्) प्रकाशसमूह का प्रहार करके सब पदार्थों को (ततक्ष) छेदन करता है, वैसे आप भी हूजिये ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जल नीचे स्थानों को जाकर स्थिर वा स्वच्छ होता है, वैसे ही राजपुरुष उत्तम-उत्तम गुणयुक्त तथा विनयवाले पुरुष को प्राप्त होकर स्थिर और शुद्धि करनेवाले होते हैं ॥ ७ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥