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Rigveda Mandal 1 / Sukta 52 / Mantra 6

191 Sukta
15 Mantra
1/52/6
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
परीं॑ घृ॒णा च॑रति तित्वि॒षे शवो॒ऽपो वृ॒त्वी रज॑सो बु॒ध्नमाश॑यत्। वृ॒त्रस्य॒ यत्प्र॑व॒णे दु॒र्गृभि॑श्वनो निज॒घन्थ॒ हन्वो॑रिन्द्र तन्य॒तुम् ॥

परि॑ । ई॒म् । घृ॒णा । च॒र॒ति॒ । ति॒त्वि॒षे । शवः॑ । अ॒पः । वृ॒त्वी । रज॑सः । बु॒ध्नम् । आ । अ॒श॒य॒त् । वृ॒त्रस्य॑ । यत् । प्र॒व॒णे । दुः॒ऽगृभि॑श्वनः । नि॒ऽज॒घन्थ॑ । हन्वोः॑ । इ॒न्द्र॒ । त॒न्य॒तुम् ॥

Mantra without Swara
परीं घृणा चरति तित्विषे शवोऽपो वृत्वी रजसो बुध्नमाशयत्। वृत्रस्य यत्प्रवणे दुर्गृभिश्वनो निजघन्थ हन्वोरिन्द्र तन्यतुम् ॥

परि। ईम्। घृणा। चरति। तित्विषे। शवः। अपः। वृत्वी। रजसः। बुध्नम्। आ। अशयत्। वृत्रस्य। यत्। प्रवणे। दुःऽगृभिश्वनः। निऽजघन्थ। हन्वोः। इन्द्र। तन्यतुम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 13 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) सूर्य के समान वर्त्तमान सभाध्यक्ष जैसे (तित्विषे) प्रकाश के लिये (यत्) जिस सूर्य का (शवः) बल वा (घृणा) दीप्ति (ईम्) जल को (परिचरति) सेवन करती है, जो (दुर्गृभिश्वनः) दुःख से जिसका ग्रहण हो (वृत्रस्य) मेघ का (बुध्नम्) शरीर (रजसः) अन्तरिक्ष के मध्य में (आपः) जल को (वृत्वी) आवरण करके (अशयत्) सोता है, उसके (हन्वोः) आगे-पीछे के मुख के अवयवों में (तन्यतुम्) बिजली को छोड़कर उसे (प्रवणे) नीचे (निजघन्थ) मार कर गिरा देता है, वैसे वर्त्तमान होकर न्याय में प्रवृत्त हूजिये ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि सूर्य वा मेघ के समान वर्त्त के विद्या और न्याय की वर्षा का प्रकाश करें ॥ ६ ॥
Subject
फिर वह सभाध्यक्ष किसके तुल्य क्या करता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥