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Rigveda Mandal 1 / Sukta 52 / Mantra 5

191 Sukta
15 Mantra
1/52/5
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ॒भि स्ववृ॑ष्टिं॒ मदे॑ अस्य॒ युध्य॑तो र॒घ्वीरि॑व प्रव॒णे स॑स्रुरू॒तयः॑। इन्द्रो॒ यद्व॒ज्री धृ॒षमा॑णो॒ अन्ध॑सा भि॒नद्व॒लस्य॑ परि॒धीँरि॑व त्रि॒तः ॥

अ॒भि । स्वऽवृ॑ष्टिम् । मदे॑ । अ॒स्य॒ । युध्य॑तः । र॒घ्वीःऽइ॑व । प्र॒व॒णे । स॒स्रुः॒ । ऊ॒तयः॑ । इन्द्रः॑ । यत् । व॒ज्री । धृ॒षमा॑णः॑ । अन्ध॑सा । भि॒नत् । व॒लस्य॑ । प॒रि॒धीन्ऽइ॑व । त्रि॒तः ॥

Mantra without Swara
अभि स्ववृष्टिं मदे अस्य युध्यतो रघ्वीरिव प्रवणे सस्रुरूतयः। इन्द्रो यद्वज्री धृषमाणो अन्धसा भिनद्वलस्य परिधीँरिव त्रितः ॥

अभि। स्वऽवृष्टिम्। मदे। अस्य। युध्यतः। रघ्वीःऽइव। प्रवणे। सस्रुः। ऊतयः। इन्द्रः। यत्। वज्री। धृषमाणः। अन्धसा। भिनत्। वलस्य। परिधीन्ऽइव। त्रितः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 12 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
(यत्) जो सूर्य्य के समान (स्ववृष्टिम्) अपने शस्त्रों की वृष्टि करता हुआ (धृषमाणः) शत्रुओं को प्रगल्भता दिखाने हारा (वज्री) शत्रुओं को छेदन करनेवाले शस्त्रसमूह से युक्त (इन्द्रः) सभाध्यक्ष (मदे) हर्ष में (अस्य) इस (युध्यतः) युद्ध करते हुए (बलस्य) शत्रु के (त्रितः) ऊपर, मध्य और टेढ़ी तीन रेखाओं से (परिधींरिव) सब प्रकार ऊपर की गोल रेखा के समान बल को (अभि भिनत्) सब प्रकार से भेदन करता है, उसके (अन्धसा) अन्नादि वा जल से (रघ्वीरिव) जैसे जल से पूर्ण नदियाँ (प्रवणे) नीचे स्थान में जाती हैं, वैसे (ऊतयः) रक्षा आदि (सस्रुः) गमन करती हैं ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जल नीचे स्थान को जाते हैं, वैसे सभाध्यक्ष नम्र होकर विनय को प्राप्त होवे ॥ ५ ॥
Subject
फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥