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Rigveda Mandal 1 / Sukta 52 / Mantra 2

191 Sukta
15 Mantra
1/52/2
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
स पर्व॑तो॒ न ध॒रुणे॒ष्वच्यु॑तः स॒हस्र॑मूति॒स्तवि॑षीषु वावृधे। इन्द्रो॒ यद्वृ॒त्रमव॑धीन्नदी॒वृत॑मु॒ब्जन्नर्णां॑सि॒ जर्हृ॑षाणो॒ अन्ध॑सा ॥

सः । पर्व॑तः । न । ध॒रुणे॑षु । अच्यु॑तः । स॒हस्र॑म्ऽऊतिः॑ । तवि॑षीषु । व॒वृ॒धे॒ । इन्द्रः॑ । यत् । वृ॒त्रम् । अव॑धीत् । न॒दी॒ऽवृत॑म् । उ॒ब्जन् । अर्णां॑सि । जर्हृ॑षाणः । अन्ध॑सा ॥

Mantra without Swara
स पर्वतो न धरुणेष्वच्युतः सहस्रमूतिस्तविषीषु वावृधे। इन्द्रो यद्वृत्रमवधीन्नदीवृतमुब्जन्नर्णांसि जर्हृषाणो अन्धसा ॥

सः। पर्वतः। न। धरुणेषु। अच्युतः। सहस्रम्ऽऊतिः। तविषीषु। ववृधे। इन्द्रः। यत्। वृत्रम्। अवधीत्। नदीऽवृतम्। उब्जन्। अर्णांसि। जर्हृषाणः। अन्धसा ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 12 Mantra » 2

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Meaning
हे राजप्रजाजन ! जैसे (धरुणेषु) धारकों में (अच्युतः) सत्य सामर्थ्य युक्त (अर्णांसि) जलों को (उब्जन्) बल पकड़ता हुआ (इन्द्रः) सविता (नदीवृतम्) नदियों से युक्त वा नदियों को वर्त्तानेवाले (वृत्रम्) मेघ को (अवधीत्) मारता है (सः) वह (पर्वतः) पर्वत के (न) समान (ववृधे) बढ़ता है, वैसे (यत्) जो तू शत्रुओं को मार (सहस्रमूतिः) असंख्यात रक्षा करनेहारे (तविषीषु) बलों में (जर्हृषाणः) बार-बार हर्ष को प्राप्त करता हुआ (अन्धसा) अन्नादि के साथ वर्त्तमान बार-बार बढ़ाता रह ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सेना आदि को धारण कर और मेघ के तुल्य अन्नादि सामग्री के साथ वर्त्तमान हो के बलों को बढ़ाता है, वह पर्वत के समान स्थिर सुखी हो शत्रुओं को मार कर राज्य के बढ़ाने में समर्थ होता है ॥ २ ॥
Subject
फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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