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Rigveda Mandal 1 / Sukta 52 / Mantra 15

191 Sukta
15 Mantra
1/52/15
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आर्च॒न्नत्र॑ म॒रुतः॒ सस्मि॑न्ना॒जौ विश्वे॑ दे॒वासो॑ अमद॒न्ननु॑ त्वा। वृ॒त्रस्य॒ यद्भृ॑ष्टि॒मता॑ व॒धेन॒ नि त्वमि॑न्द्र॒ प्रत्या॒नं ज॒घन्थ॑ ॥

आर्च॑न् । अत्र॑ । म॒रुतः॑ । सस्मि॑न् । आ॒जौ । विश्वे॑ । दे॒वासः॑ । अ॒म॒द॒न् । अनु॑ । त्वा॒ । वृ॒त्रस्य॑ । यत् । भृ॒ष्टि॒ऽमता॑ । व॒धेन॑ । नि । त्वम् । इ॒न्द्र॒ । प्रति॑ । आ॒नम् । ज॒घन्थ॑ ॥

Mantra without Swara
आर्चन्नत्र मरुतः सस्मिन्नाजौ विश्वे देवासो अमदन्ननु त्वा। वृत्रस्य यद्भृष्टिमता वधेन नि त्वमिन्द्र प्रत्यानं जघन्थ ॥

आर्चन्। अत्र। मरुतः। सस्मिन्। आजौ। विश्वे। देवासः। अमदन्। अनु। त्वा। वृत्रस्य। यत्। भृष्टिऽमता। वधेन। नि। त्वम्। इन्द्र। प्रति। आनम्। जघन्थ ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 14 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त सभा सेना के स्वामी (यत्) जो (त्वम्) आप (भृष्टिमता) प्रशंसनीय नीतिवाले न्यायव्यवहार से युक्त (वधेन) हनन से (वृत्रस्य) अधर्मी मनुष्य के समान (आनम्) प्राण को (जघन्थ) नष्ट करते हो, उन (त्वा) आपको (सस्मिन्) सब (आजौ) संग्राम वा (अत्र) इस आप में श्रद्धा करनेवाले (विश्वे देवासः) सब विद्वान् और (मरुतः) ऋत्विज् लोग (न्यार्चन्) नित्य सत्कार करते हैं, इससे वे प्रजा के प्राणी (प्रत्यन्वमदन्) सबको आनन्दित कर के आप आनन्दित होते हैं ॥ १५ ॥
Essence
जो एक परमेश्वर की उपासना विद्या को ग्रहण और शत्रुओं को ताड़कर प्रजा को निरन्तर आनन्दित करते हैं, वे ही धार्मिक विद्वान् सुखी रहते हैं ॥ १२ ॥ इस सूक्त में विद्वान्, बिजुली आदि अग्नि और ईश्वर के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥
Subject
फिर ईश्वरोपासक कैसे हों, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥