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Rigveda Mandal 1 / Sukta 52 / Mantra 14

191 Sukta
15 Mantra
1/52/14
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
न यस्य॒ द्यावा॑पृथि॒वी अनु॒ व्यचो॒ न सिन्ध॑वो॒ रज॑सो॒ अन्त॑मान॒शुः। नोत स्ववृ॑ष्टिं॒ मदे॑ अस्य॒ युध्य॑त॒ एको॑ अ॒न्यच्च॑कृषे॒ विश्व॑मानु॒षक् ॥

न । यस्य॑ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । अनु॑ । व्यचः॑ । न । सिन्ध॑वः । रज॑सः । अन्त॑म् । आ॒न॒शुः । न । उ॒त । स्वऽवृ॑ष्टिम् । मदे॑ । अ॒स्य॒ । युध्य॑तः । एकः॑ । अ॒न्यत् । च॒कृ॒षे॒ । विश्व॑म् । आ॒नु॒षक् ॥

Mantra without Swara
न यस्य द्यावापृथिवी अनु व्यचो न सिन्धवो रजसो अन्तमानशुः। नोत स्ववृष्टिं मदे अस्य युध्यत एको अन्यच्चकृषे विश्वमानुषक् ॥

न। यस्य। द्यावापृथिवी इति। अनु। व्यचः। न। सिन्धवः। रजसः। अन्तम्। आनशुः। न। उत। स्वऽवृष्टिम्। मदे। अस्य। युध्यतः। एकः। अन्यत्। चकृषे। विश्वम्। आनुषक् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 14 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
(यस्य) जिस (रजसः) ऐश्वर्ययुक्त जगदीश्वर की (अनुव्यचः) अनन्तव्याप्ति के अनुकूल वर्त्तमान (द्यावापृथिवी) प्रकाश अप्रकाश युक्त लोक और चन्द्रमादि भी (अन्तम्) अन्त अर्थात् सीमा को (न) नहीं (आनशुः) प्राप्त होते हैं, हे परमात्मन् ! जैसे (स्ववृष्टिम्) अपने पदार्थों की रक्षा के प्रति (मदे) आनन्द में (युध्यतः) युद्ध करते हुए मेघ का सूर्य के सामने विजय नहीं होता, वैसे (एकः) सहायरहित अद्वितीय जगदीश्वर ने (अन्यत्) अपने से भिन्न द्वितीय (विश्वम्) जगत् को (आनुषक्) अपनी व्याप्ति से युक्त किया है, इससे आप उपासना के योग्य हैं ॥ १४ ॥
Essence
जैसे परमेश्वर के किसी गुण की कोई मनुष्य वा कोई लोक सीमा को ग्रहण नहीं कर सकता और जैसे वह पापयुक्त कर्म करनेवाले मनुष्यों के लिये दुःखरूप फल देने से पीड़ा देता दुष्टों की ताड़ना करता और सूर्य मेघाऽवयवों को विदारण करता और युद्ध करनेवाले मनुष्य के समान वर्त्तता है, वैसे ही सब सज्जन मनुष्यों को वर्त्तना चाहिये ॥ १४ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥