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Rigveda Mandal 1 / Sukta 52 / Mantra 13

191 Sukta
15 Mantra
1/52/13
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वं भु॑वः प्रति॒मानं॑ पृथि॒व्या ऋ॒ष्ववी॑रस्य बृह॒तः पति॑र्भूः। विश्व॒माप्रा॑ अ॒न्तरि॑क्षं महि॒त्वा स॒त्यम॒द्धा नकि॑र॒न्यस्त्वावा॑न् ॥

त्वम् । भु॒वः॒ । प्र॒ति॒ऽमान॑म् । पृ॒थि॒व्याः । ऋ॒ष्वऽवी॑रस्य । बृ॒ह॒तः । पतिः॑ । भूः॒ । विश्व॑म् । आ । अ॒प्राः॒ । अ॒न्तरि॑क्षम् । म॒हि॒ऽत्वा । स॒त्यम् । अ॒द्धा । नकिः॑ । अ॒न्यः । त्वाऽवा॑न् ॥

Mantra without Swara
त्वं भुवः प्रतिमानं पृथिव्या ऋष्ववीरस्य बृहतः पतिर्भूः। विश्वमाप्रा अन्तरिक्षं महित्वा सत्यमद्धा नकिरन्यस्त्वावान् ॥

त्वम्। भुवः। प्रतिऽमानम्। पृथिव्याः। ऋष्वऽवीरस्य। बृहतः। पतिः। भूः। विश्वम्। आ। अप्राः। अन्तरिक्षम्। महिऽत्वा। सत्यम्। अद्धा। नकिः। अन्यः। त्वाऽवान् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 14 Mantra » 3

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Meaning
हे जगदीश्वर ! जो (त्वम्) आप (पृथिव्याः) विस्तृत आकाश और (भुवः) भूमि के (प्रतिमानम्) परिमाणकर्त्ता तथा (बृहतः) महाबलयुक्त (ऋष्ववीरस्य) बड़े गुणयुक्त जगत् का वा महावीर मनुष्य के (पतिः) पालन करनेवाले (भूः) हैं तथा आप (विश्वम्) सब जगत् (अन्तरिक्षम्) अनेक लोकों के मध्य में अवकाशस्वरूप आकाश और (सत्यम्) कारणरूप से अविनाशी अच्छे प्रकार परीक्षा किये हुए चारों वेदों को (महित्वा) बड़ी व्याप्ति से व्याप्त होकर (अद्धाप्राः) साक्षात्कार पूरण करते हो, इससे (त्वावान्) आप के सदृश (अन्यः) दूसरा (नकिः) विद्यमान कोई भी नहीं है ॥ १३ ॥
Essence
जैसे परमेश्वर ही सब जगत् की रचना, परिमाण, व्यापक और सत्य का प्रकाश करनेवाला है, इससे ईश्वर के सदृश कोई भी पदार्थ न हुआ और न होगा, ऐसा समझ के हम लोग उसी की उपासना करें ॥ १३ ॥
Subject
फिर वह परब्रह्म कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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