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Rigveda Mandal 1 / Sukta 52 / Mantra 11

191 Sukta
15 Mantra
1/52/11
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
यदिन्न्वि॑न्द्र पृथि॒वी दश॑भुजि॒रहा॑नि॒ विश्वा॑ त॒तन॑न्त कृ॒ष्टयः॑। अत्राह॑ ते मघव॒न्विश्रु॑तं॒ सहो॒ द्यामनु॒ शव॑सा ब॒र्हणा॑ भुवत् ॥

यत् । इत् । नु । इ॒न्द्र॒ । पृ॒थि॒वी । दश॑ऽभुजिः । अहा॑नि । विश्वा॑ । त॒तन॑न्त । कृ॒ष्टयः॑ । अत्र॑ । अह॑ । ते॒ । म॒घ॒ऽव॒न् । विऽश्रु॑तम् । सहः॑ । द्याम् । अनु॑ । शव॑सा ब॒र्हणा॑ । भु॒व॒त् ॥

Mantra without Swara
यदिन्न्विन्द्र पृथिवी दशभुजिरहानि विश्वा ततनन्त कृष्टयः। अत्राह ते मघवन्विश्रुतं सहो द्यामनु शवसा बर्हणा भुवत् ॥

यत्। इत्। नु। इन्द्र। पृथिवी। दशऽभुजिः। अहानि। विश्वा। ततनन्त। कृष्टयः। अत्र। अह। ते। मघऽवन्। विऽश्रुतम्। सहः। द्याम्। अनु। शवसा बर्हणा। भुवत् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 14 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मघवन्) उत्कृष्ट धन और विद्या के ऐश्वर्य से युक्त (इन्द्र) सभा सेनाध्यक्ष ! आप (यत्) जो (दशभुजिः) दश इन्द्रियों से (पृथिवी) भूमि को भोगते हो (ते) आप के (बर्हणा) सब सुख प्राप्त कराने वा (शवसा) (अह) बल से ही (द्याम्) राज्यपालन (अनुविश्रुतम्) अनुकूल कीर्ति करानेवाला यश (सहः) बल (भुवत्) होवे, उससे युक्त होके आप प्रयत्न कीजिये, जिससे (अत्र) इस राज्य में (कृष्टयः) मनुष्य लोग (विश्वा) सब (अहानि) दिनों को (इत्) ही सुख से (नु) जल्दी (ततनन्त) विस्तार करें ॥ ११ ॥
Essence
राजपुरुषों को चाहिये कि जैसे अपने राज्य में सुखों की वृद्धि और अनेक प्रकार से गुणों की प्राप्ति हो, वैसा अनुष्ठान करें ॥ ११ ॥
Subject
फिर वह सभाध्यक्ष क्या करे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥