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Rigveda Mandal 1 / Sukta 52 / Mantra 10

191 Sukta
15 Mantra
1/52/10
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- स्वराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
द्यौश्चि॑द॒स्याम॑वाँ॒ अहेः॑ स्व॒नादयो॑यवीद्भि॒यसा॒ वज्र॑ इन्द्र ते। वृ॒त्रस्य॒ यद्ब॑द्बधा॒नस्य॑ रोदसी॒ मदे॑ सु॒तस्य॒ शव॒साभि॑न॒च्छिरः॑ ॥

द्यौः । चि॒त् । अ॒स्य॒ । अम॑ऽवान् । अहेः॑ । स्व॒नात् । अयो॑यवीत् । भि॒यसा॑ । वज्रः॑ । इ॒न्द्र॒ । ते॒ । वृ॒त्रस्य॑ । यत् । ब॒द्ब॒धा॒नस्य॑ । रो॒द॒सी॒ इति॑ । मदे॑ । सु॒तस्य॑ । शव॑सा । अभि॑नत् । शिरः॑ ॥

Mantra without Swara
द्यौश्चिदस्यामवाँ अहेः स्वनादयोयवीद्भियसा वज्र इन्द्र ते। वृत्रस्य यद्बद्बधानस्य रोदसी मदे सुतस्य शवसाभिनच्छिरः ॥

द्यौः। चित्। अस्य। अमऽवान्। अहेः। स्वनात्। अयोयवीत्। भियसा। वज्रः। इन्द्र। ते। वृत्रस्य। यत्। बद्बधानस्य। रोदसी इति। मदे। सुतस्य। शवसा। अभिनत्। शिरः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 13 Mantra » 5

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Meaning
हे (इन्द्र) परम ऐश्वर्य के हेतु सेनापति ! जो (अस्य) इस (ते) आप का और इस सूर्य्य का (द्यौः) प्रकाश (अहेः) (बद्बधानस्य) रोकनेवाले मेघ के (सुतस्य) उत्पन्न हुए (वृत्रस्य) आवरणकारक जल के अवयवों को (अयोयवीत्) मिलाता वा पृथक् करता है (चित्) वैसे (अमवान्) बलकारी (वज्रः) वज्र के (स्वनात्) शब्दों से (भियसा) और भय से (शवसा) बल के साथ शत्रु लोग भागते हैं (रोदसी) आकाश और पृथिवी के समान (मदे) आनन्दकारी व्यवहार में वर्त्तमान शत्रु का (शिरः) शिर (अभिनत्) काटते हैं, सो आप हम लोगों का पालन कीजिये ॥ १० ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य के किरण और बिजुली मेघ के साथ प्रवृत्त होती हैं, वैसे ही सेनापति आदि के साथ सेना को होना चाहिये ॥ १० ॥
Subject
फिर वह क्या करे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

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