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Rigveda Mandal 1 / Sukta 51 / Mantra 9

191 Sukta
15 Mantra
1/51/9
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अनु॑व्रताय र॒न्धय॒न्नप॑व्रताना॒भूभि॒रिन्द्रः॑ श्न॒थय॒न्नना॑भुवः। वृ॒द्धस्य॑ चि॒द्वर्ध॑तो॒ द्यामिन॑क्षतः॒ स्तवा॑नो व॒म्रो वि ज॑घान सं॒दिहः॑ ॥

अनु॑ऽव्रताय । र॒न्धय॑न् । अप॑ऽव्रतान् । आ॒ऽभूभिः॑ । इन्द्रः॑ । श्न॒थय॑न् । अना॑भुवः । वृ॒द्धस्य॑ । चि॒त् । वर्ध॑तः । द्याम् । इन॑क्षतः । स्तवा॑नः । व॒म्रः । वि । ज॒घा॒न॒ । स॒म्ऽदिहः॑ ॥

Mantra without Swara
अनुव्रताय रन्धयन्नपव्रतानाभूभिरिन्द्रः श्नथयन्ननाभुवः। वृद्धस्य चिद्वर्धतो द्यामिनक्षतः स्तवानो वम्रो वि जघान संदिहः ॥

अनुऽव्रताय। रन्धयन्। अपऽव्रतान्। आऽभूभिः। इन्द्रः। श्नथयन्। अनाभुवः। वृद्धस्य। चित्। वर्धतः। द्याम्। इनक्षतः। स्तवानः। वम्रः। वि। जघान। सम्ऽदिहः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 10 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
मनुष्यों को उचित है कि जो (इन्द्रः) परम विद्या आदि ऐश्वर्य्य, सभा, शाला, सेना और न्याय का अध्यक्ष (आभूभिः) उत्तम वीरों को शिक्षा करनेवाली क्रियाओं के साथ वर्त्तमान (अनुव्रताय) अनुकूल धर्मयुक्त व्रतों के धारण करनेवाले आर्य मनुष्य के लिये (अपव्रतान्) मिथ्या भाषणादि दुष्ट कर्मयुक्त डाकू मनुष्यों को (रन्धयन्) अति ताड़ना करता हुआ (अनाभुवः) जो धर्मात्माओं से विरुद्ध मनुष्य हैं, उन पापियों को (श्नथयन्) शिथिल करता (इनक्षतः) व्याप्तियुक्त (वर्धतः) गुण दोषों से बढ़नेवाले (वृद्धस्य) ज्ञानादि गुणों से युक्त श्रेष्ठ की (स्तवानः) स्तुति का कर्त्ता (वम्रः) अधर्म का नाश (संदिहः) धर्माऽधर्म को संदेह से निश्चय करनेवाला (द्याम्) सूर्य प्रकाश के (चित्) समान विद्या के प्रकाश को विस्तारयुक्त करता हुआ दुष्टों को (विजघान) विशेष करके मारता है, उसी कुल को सुभूषित करनेवाले आर्य मनुष्य को सर्वाधिपतिपन में स्वीकार कर राजधर्म का यथावत् पालन करें ॥ ९ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। सब धार्मिक मनुष्यों को उचित है कि सब मनुष्यों को अविद्या से निवारण और विद्या पढ़ा विद्वान् करके धर्माऽधर्म के विचारपूर्वक निश्चय से धर्म का ग्रहण और अधर्म का त्याग करें। सदैव आर्यों का सङ्ग डाकुओं के सङ्ग का त्याग कर सबसे उत्तम व्यवस्था में वर्त्तें ॥ ९ ॥
Subject
फिर वह क्या करके किस को करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥