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Rigveda Mandal 1 / Sukta 51 / Mantra 7

191 Sukta
15 Mantra
1/51/7
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वे विश्वा॒ तवि॑षी स॒ध्र्य॑ग्घि॒ता तव॒ राधः॑ सोमपी॒थाय॑ हर्षते। तव॒ वज्र॑श्चिकिते बा॒ह्वोर्हि॒तो वृ॒श्चा शत्रो॒रव॒ विश्वा॑नि॒ वृष्ण्या॑ ॥

त्वे इति॑ । विश्वा॑ । तवि॑षी । स॒ध्र्य॑क् । हि॒ता । तव॑ । राधः॑ । सो॒म॒ऽपी॒थाय॑ । ह॒र्ष॒ते॒ । तव॑ । वज्रः॑ । चि॒कि॒ते॒ । बा॒ह्वोः । हि॒तः । वृ॒श्च । शत्रोः॑ । अव॑ । विश्वा॑नि । वृष्ण्या॑ ॥

Mantra without Swara
त्वे विश्वा तविषी सध्र्यग्घिता तव राधः सोमपीथाय हर्षते। तव वज्रश्चिकिते बाह्वोर्हितो वृश्चा शत्रोरव विश्वानि वृष्ण्या ॥

त्वे इति। विश्वा। तविषी। सध्र्यक्। हिता। तव। राधः। सोमऽपीथाय। हर्षते। तव। वज्रः। चिकिते। बाह्वोः। हितः। वृश्च। शत्रोः। अव। विश्वानि। वृष्ण्या ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 10 Mantra » 2

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Meaning
हे विद्वन् मनुष्य ! (त्वे) आप में जो (विश्वा) सब (तविषी) बल (हिता) स्थापित किया हुआ (सध्र्यक्) साथ सेवन करनेवाला (राधः) धन (सोमपीथाय) सुख करनेवाले पदार्थों के भोग के लिये (हर्षते) हर्षयुक्त करता है, जो (तव) आपके (बाह्वोः) भुजाओं में (हितः) धारण किया (वज्रः) शस्त्रसमूह है, जिससे आप (चिकिते) सुखों को जानते हो, उससे हम लोगों के (विश्वानि) सब (वृष्ण्या) वीरों के लिये हित करनेवाले बल की (अव) रक्षा और (शत्रोः) शत्रु के बल का नाश कीजिये ॥ ७ ॥
Essence
जो श्रेष्ठों में बल उत्पन्न हो तो उससे सब मनुष्यों को सुख होवे, जो दुष्टों में बल होवे तो उससे सब मनुष्यों को दुःख होवे, इससे श्रेष्ठों के सुख की वृद्धि और दुष्टों के बल की हानि निरन्तर करनी चाहिये ॥ ७ ॥
Subject
फिर वह सभा आदि का अध्यक्ष कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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