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Rigveda Mandal 1 / Sukta 51 / Mantra 6

191 Sukta
15 Mantra
1/51/6
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वं कुत्सं॑ शुष्ण॒हत्ये॑ष्वावि॒थार॑न्धयोऽतिथि॒ग्वाय॒ शम्ब॑रम्। म॒हान्तं॑ चिदर्बु॒दं नि क्र॑मीः प॒दा स॒नादे॒व द॑स्यु॒हत्या॑य जज्ञिषे ॥

त्वम् । कुत्स॑म् । शुष्ण॒ऽहत्ये॑षु । आ॒वि॒थ॒ । अर॑न्धयः । अ॒ति॒थि॒ऽग्वाय॑ । शम्ब॑रम् । म॒हान्त॑म् । चि॒त् । अ॒र्बु॒दम् । नि । क्र॒मीः॒ । प॒दा । स॒नात् । ए॒व । द॒स्यु॒ऽहत्या॑य । ज॒ज्ञि॒षे॒ ॥

Mantra without Swara
त्वं कुत्सं शुष्णहत्येष्वाविथारन्धयोऽतिथिग्वाय शम्बरम्। महान्तं चिदर्बुदं नि क्रमीः पदा सनादेव दस्युहत्याय जज्ञिषे ॥

त्वम्। कुत्सम्। शुष्णऽहत्येषु। आविथ। अरन्धयः। अतिथिऽग्वाय। शम्बरम्। महान्तम्। चित्। अर्बुदम्। नि। क्रमीः। पदा। सनात्। एव। दस्युऽहत्याय। जज्ञिषे ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 10 Mantra » 1

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Meaning
हे विद्वन् शूरवीर मनुष्य ! जिससे (त्वम्) तू (पदा) पाद से आक्रान्त हुए शत्रुसमूह को मारनेवाले के (चित्) समान (शुष्णहत्येषु) शत्रुओं के बलों के हनने योग्य व्यवहारों में (महान्तम्) महागुणविशिष्ट (कुत्सम्) वज्रादि को धारण करके प्रजा की (आविथ) रक्षा करते और दुष्टों को (अरन्धयः) मारते हो (अतिथिग्वाय) अतिथियों के जाने-आने को शुद्ध मार्ग के लिये (अर्बुदम्) असंख्यात गुणविशिष्ट (शम्बरम्) बल को (नि क्रमीः) क्रम से बढ़ाते हो (सनात्) अच्छे प्रकार सेवन करने से (पदा) पदाक्रान्त शत्रुसेना का नाश करते हो (दस्युहत्याय) शत्रुओं के मारने रूप व्यवहार के लिये (एव) ही (जज्ञिषे) उत्पन्न हुए हो, इससे हम लोग आप का सत्कार करते हैं ॥ ६ ॥
Essence
सभाध्यक्षादिकों को योग्य है कि जैसे शत्रुओं को मार, श्रेष्ठों की रक्षा, मार्गों को शुद्ध और असंख्यात बल को धारण कर शत्रुओं के मारने के लिये अत्यन्त प्रभाव बढ़ावें ॥ ६ ॥
Subject
फिर भी अगले मन्त्र में सभाध्यक्ष के गुणों का उपदेश किया है ॥

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