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Rigveda Mandal 1 / Sukta 51 / Mantra 12

191 Sukta
15 Mantra
1/51/12
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
आ स्मा॒ रथं॑ वृष॒पाणे॑षु तिष्ठसि शार्या॒तस्य॒ प्रभृ॑ता॒ येषु॒ मन्द॑से। इन्द्र॒ यथा॑ सु॒तसो॑मेषु चा॒कनो॑ऽन॒र्वाणं॒ श्लोक॒मा रो॑हसे दि॒वि ॥

आ । स्म॒ । रथ॑म् । वृ॒ष॒ऽपाने॑षु । ति॒ष्ठ॒सि॒ । शा॒र्या॒तस्य॑ । प्रऽभृ॑ताः । येषु॑ । मन्द॑से । इन्द्र॑ । यथा॑ । सु॒तऽसो॑मेषु । चा॒कनः॑ । अ॒न॒र्वाण॑म् । श्लोक॑म् । आ । रो॒ह॒से॒ । दि॒वि ॥

Mantra without Swara
आ स्मा रथं वृषपाणेषु तिष्ठसि शार्यातस्य प्रभृता येषु मन्दसे। इन्द्र यथा सुतसोमेषु चाकनोऽनर्वाणं श्लोकमा रोहसे दिवि ॥

आ। स्म। रथम्। वृषऽपानेषु। तिष्ठसि। शार्यातस्य। प्रऽभृताः। येषु। मन्दसे। इन्द्र। यथा। सुतऽसोमेषु। चाकनः। अनर्वाणम्। श्लोकम्। आ। रोहसे। दिवि ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 11 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) उत्तम ऐश्वर्यवाले सभाध्यक्ष ! जिससे तू (यथा) जैसे विद्वान् लोग पदार्थविद्या को सिद्ध करके सुखों को प्राप्त होते और जो (शार्यातस्य) वीर पुरुष के (येषु) जिन (सुतसोमेषु) उत्तम रसों से युक्त (वृषपाणेषु) पुष्टि करनेवाले सोमलतादि पदार्थों अर्थात् वैद्यक शास्त्र की रीति से अति श्रेष्ठ बनाये हुए उत्तम व्यवहारों में (प्रभृताः) धारण किये हों, वैसे उनको प्राप्त होके (मन्दसे) आनन्दित होने और (अनर्वाणम्) अग्नि आदि अश्वसहित, पशु आदि अश्वरहित (श्लोकम्) सब अवयवों से सहित रथ के मध्य (स्म) ही (आतिष्ठसि) स्थित और उस की (चाकनः) इच्छा करते हैं और (दिवि) प्रकाशरूप सूर्य्यलोक में (आरोहसे) आरोहण करते हो (स्म) इसलिये आप योग्य हो ॥ १२ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। विमानादि यान वा विद्वानों के सङ्ग के विना किसी मनुष्य को सुख नहीं हो सकता। इससे विद्वानों के सभा वा पदार्थों के ज्ञान के उपयोग से सब मनुष्यों को आनन्द में रहना चाहिये ॥ १२ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥