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Rigveda Mandal 1 / Sukta 51 / Mantra 10

191 Sukta
15 Mantra
1/51/10
Devata- इन्द्र: Rishi- सव्य आङ्गिरसः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
तक्ष॒द्यत्त॑ उ॒शना॒ सह॑सा॒ सहो॒ वि रोद॑सी म॒ज्मना॑ बाधते॒ शवः॑। आ त्वा॒ वात॑स्य नृमणो मनो॒युज॒ आ पूर्य॑माणमवहन्न॒भि श्रवः॑ ॥

तक्ष॑त् । यत् । ते॒ । उ॒शना॑ । सह॑सा । सहः॑ । वि । रोद॑सी॒ इति॑ । म॒ज्मना॑ । बा॒ध॒ते॒ । शवः॑ । आ । त्वा॒ । वात॑स्य । नृ॒ऽम॒नः॒ । म॒नः॒ऽयुजः॑ । आ । पूर्य॑माणम् । अ॒व॒ह॒न् । अ॒भि । श्रवः॑ ॥

Mantra without Swara
तक्षद्यत्त उशना सहसा सहो वि रोदसी मज्मना बाधते शवः। आ त्वा वातस्य नृमणो मनोयुज आ पूर्यमाणमवहन्नभि श्रवः ॥

तक्षत्। यत्। ते। उशना। सहसा। सहः। वि। रोदसी इति। मज्मना। बाधते। शवः। आ। त्वा। वातस्य। नृऽमनः। मनःऽयुजः। आ। पूर्यमाणम्। अवहन्। अभि। श्रवः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 10 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (नृमणाः) मनुष्यों में मन देनेवाले (उशना) कामयमान विद्वान् आप ! (सहसा) अपने सामर्थ्य से शत्रुओं के (सहः) बल का हनन कर के जैसे सूर्य (रोदसी) भूमि और प्रकाश को करता है, वैसे (मज्मना) शुद्ध बल से (शवः) शत्रुओं के बल को (विबाधते) विलोड़न वा (आतक्षत्) छेदन करते हो और (ते) आप के (मनोयुजः) मन से युक्त होनेवाले भृत्य (त्वा) आप का आश्रय ले के (ते) आप के (वातस्य) बलयुक्त वायु के सम्बन्धी (आपूर्यमाणम्) न्यूनतारहित (श्रवः) श्रवण और अन्नादि को (अभ्यावहन्) प्राप्त होवें ॥ १० ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वान् सभाध्यक्ष के विना पृथिवी के राज्य की व्यवस्था शत्रुओं के बल की हानि विद्यादि सद्गुणों का प्रकाश और उत्तम अन्नादि की प्राप्ति नहीं होती ॥ १० ॥
Subject
फिर वह सभाध्यक्ष कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥