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Rigveda Mandal 1 / Sukta 50 / Mantra 11

191 Sukta
13 Mantra
1/50/11
Devata- सूर्यः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
उ॒द्यन्न॒द्य मि॑त्रमह आ॒रोह॒न्नुत्त॑रां॒ दिव॑म् । हृ॒द्रो॒गं मम॑ सूर्य हरि॒माणं॑ च नाशय ॥

उ॒त्ऽयन् । अ॒द्य । मि॒त्र॒ऽम॒हः॒ । आ॒ऽरोह॑न् । उत्ऽत॑राम् । दिव॑म् । हृ॒त्ऽरो॒गम् । मम॑ । सू॒र्य॒ । ह॒रि॒माण॑म् । च॒ । ना॒श॒य॒ ॥

Mantra without Swara
उद्यन्नद्य मित्रमह आरोहन्नुत्तरां दिवम् । हृद्रोगं मम सूर्य हरिमाणं च नाशय ॥

उत्यन् । अद्य । मित्रमहः । आरोहन् । उत्तराम् । दिवम् । हृत्रोगम् । मम । सूर्य । हरिमाणम् । च । नाशय॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 8 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मित्रमहः) मित्रो से सत्कार के योग्य (सूर्य्य) सब ओषधी और रोगनिवारण विद्याओं के जाननेवाले विद्वान् ! आप जैसे (अद्य) आज (उद्यन्) उदय को प्राप्त हुआ वा (उत्तमम्) कारण रूपी (दिवम्) दीप्ति को (आरोहन्) अच्छे प्रकार करता हुआ अन्धकार का निवारण कर दिन को प्रकट करता है वैसे मेरे (हृद्रोगम्) हृदय के रोगों और (हरिमाणम्) हरणशील चोर आदि को (नाशय) नष्ट कीजिये ॥११॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे सूर्य के उदय में अन्धेर और चोरादि निवृत्त हो जाते हैं वैसे उत्तम वैद्य की प्राप्ति से कुपथ्य और रोगों का निवारण हो जाता है ॥११॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।