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Rigveda Mandal 1 / Sukta 50 / Mantra 10

191 Sukta
13 Mantra
1/50/10
Devata- सूर्यः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
उद्व॒यं तम॑स॒स्परि॒ ज्योति॒ष्पश्य॑न्त॒ उत्त॑रम् । दे॒वं दे॑व॒त्रा सूर्य॒मग॑न्म॒ ज्योति॑रुत्त॒मम् ॥

उत् । व॒यम् । तम॑सः । परि॑ । ज्योतिः॑ । पश्य॑न्तः । उत्ऽत॑रम् । दे॒वम् । दे॒व॒ऽत्रा । सूर्य॑म् । अग॑न्म । ज्योतिः॑ । उ॒त्ऽत॒मम् ॥

Mantra without Swara
उद्वयं तमसस्परि ज्योतिष्पश्यन्त उत्तरम् । देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम् ॥

उत् । वयम् । तमसः । परि । ज्योतिः । पश्यन्तः । उत्तरम् । देवम् । देवत्रा । सूर्यम् । अगन्म । ज्योतिः । उत्तमम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 8 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यों ! जैसे (ज्योति) ईश्वर ने उत्पन्न किये प्रकाशमान सूर्य्य को (पश्यन्तः) देखते हुए (वयम्) हम लोग (तमसः) अज्ञानान्धकार से अलग होके (ज्योतिः) प्रकाशस्वरूप (उत्तरम्) सबसे उत्तम प्रलय से ऊर्ध्व वर्त्तमान वा प्रलय करनेहारा (देवत्रा) देव मनुष्य पृथिव्यादिकों में व्यापक (देवम्) सुख देने (उत्तमम्) उत्कृष्ट गुण कर्म स्वभाव युक्त (सूर्य्यम्) सर्वात्मा ईश्वर को (पर्युदगन्म) सब प्रकार प्राप्त होवें वैसे तुम भी उस को प्राप्त होओ ॥१०॥
Essence
इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। मनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वर के सदृश कोई भी उत्तम पदार्थ नहीं और न इसकी प्राप्ति के विना मुक्ति सुख को प्राप्त होने योग्य कोई भी मनुष्य हो सकता है ऐसा निश्चित जानें ॥१०॥
Subject
फिर उसको विद्वान्लोग किस प्रकार का जानें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।