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Rigveda Mandal 1 / Sukta 5 / Mantra 3

191 Sukta
10 Mantra
1/5/3
Devata- इन्द्र: Rishi- मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः Chhanda- पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स घा॑ नो॒ योग॒ अ भु॑व॒त्स रा॒ये स पुरं॑ध्याम्। गम॒द्वाजे॑भि॒रा स नः॑॥

सः । घ॒ । नः॒ । योगे॑ । आ । भु॒व॒त् । सः । रा॒ये । सः । पुर॑म्ऽध्याम् । गम॑त् । वाजे॑भिः । आ । सः । नः॒ ॥

Mantra without Swara
स घा नो योग अ भुवत्स राये स पुरंध्याम्। गमद्वाजेभिरा स नः॥

सः। घ। नः। योगे। आ। भुवत्। सः। राये। सः। पुरम्ऽध्याम्। गमत्। वाजेभिः। आ। सः। नः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 9 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
(सः) पूर्वोक्त इन्द्र परमेश्वर और स्पर्शवान् वायु (नः) हम लोगों के (योगे) सब सुखों के सिद्ध करानेवाले वा पदार्थों को प्राप्त करानेवाले योग तथा (सः) वे ही (राये) उत्तम धन के लाभ के लिये और (सः) वे (पुरन्ध्याम्) अनेक शास्त्रों की विद्याओं से युक्त बुद्धि में (आ भुवत्) प्रकाशित हों। इसी प्रकार (सः) वे (वाजेभिः) उत्तम अन्न और विमान आदि सवारियों के सह वर्त्तमान (नः) हम लोगों को (आगमत्) उत्तम सुख होने का ज्ञान देवे तथा यह वायु भी इस विद्या की सिद्धि में हेतु होता है॥३॥
Essence
इस मन्त्र में भी श्लेषालङ्कार है। ईश्वर पुरुषार्थी मनुष्य का सहायकारी होता है, आलसी का नहीं, तथा स्पर्शवान् वायु भी पुरुषार्थ ही से कार्य्यसिद्धि का निमित्त होता है, क्योंकि किसी प्राणी को पुरुषार्थ के विना धन वा बुद्धि का और इन के विना उत्तम सुख का लाभ कभी नहीं हो सकता। इसलिये सब मनुष्यों को उद्योगी अर्थात् पुरुषार्थी आशावाले अवश्य होना चाहिये॥३॥
Subject
वे दोनों तुम हम और सब प्राणिलोगों के लिये क्या करते हैं, सो अगले मन्त्र में प्रकाश किया है-