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Rigveda Mandal 1 / Sukta 49 / Mantra 3

191 Sukta
4 Mantra
1/49/3
Devata- उषाः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
वय॑श्चित्ते पत॒त्रिणो॑ द्वि॒पच्चतु॑ष्पदर्जुनि । उषः॒ प्रार॑न्नृ॒तूँरनु॑ दि॒वो अन्ते॑भ्य॒स्परि॑ ॥

वयः॑ । चि॒त् । ते॒ । प॒त॒त्रिणः॑ । द्वि॒पत् । चतुः॑ऽपत् । अ॒र्जु॒नि॒ । उषः॑ । प्र । आ॒र॒न् ऋ॒तून् । अनु॑ । दि॒वः । अन्ते॑भ्यः । परि॑ ॥

Mantra without Swara
वयश्चित्ते पतत्रिणो द्विपच्चतुष्पदर्जुनि । उषः प्रारन्नृतूँरनु दिवो अन्तेभ्यस्परि ॥

वयः । चित् । ते । पतत्रिणः । द्विपत् । चतुःपत् । अर्जुनि । उषः । प्र । आरन् ऋतून् । अनु । दिवः । अन्तेभ्यः । परि॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 6 Mantra » 3

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Meaning
हे स्त्रि ! जैसे (अर्जुनि) अच्छे प्रकार प्रयत्न का निमित्त (उषः) उषा (दिवः) सूर्य्यप्रकाश के (अन्तेभ्यः) समीप से (ऋतून्) ऋतुओं को सिद्ध और (द्विपत्) मनुष्यादि तथा (चतुष्पत्) पशु आदि का बोध कराती हुई सबको प्राप्त होके जैसे इससे (पतत्त्रिणः) नीचे ऊचे उड़नेवाले (वयः) पक्षी (प्रारन्) इधर उधर जाते (चित्) वैसे ही (ते) तेरे गुण हों ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालंकार है जैसे उषा मुहूर्त्त, प्रहर, दिन, मास, ऋतु, अयन अर्थात् दक्षिणायन और वर्षो का विभाग करती हुई सब प्राणियों के व्यवहार और चेतनता को करती है वैसे ही स्त्री सब गृहकृत्यों को पृथक्-२ करें ॥३॥
Subject
फिर वह कैसी है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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