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Rigveda Mandal 1 / Sukta 48 / Mantra 8

191 Sukta
16 Mantra
1/48/8
Devata- उषाः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
विश्व॑मस्या नानाम॒ चक्ष॑से॒ जग॒ज्ज्योति॑ष्कृणोति सू॒नरी॑ । अप॒ द्वेषो॑ म॒घोनी॑ दुहि॒ता दि॒व उ॒षा उ॑च्छ॒दप॒ स्रिधः॑ ॥

विश्व॑म् । अ॒स्याः॒ । न॒ना॒म॒ । चक्ष॑से । जग॑त् । ज्योतिः॑ । कृ॒णो॒ति॒ । सू॒नरी॑ । अप॑ । द्वेषः॑ । म॒घोनी॑ । दि॒वः । उ॒षाः । उ॒च्छ॒त् । अप॑ । स्रिधः॑ ॥

Mantra without Swara
विश्वमस्या नानाम चक्षसे जगज्ज्योतिष्कृणोति सूनरी । अप द्वेषो मघोनी दुहिता दिव उषा उच्छदप स्रिधः ॥

विश्वम् । अस्याः । ननाम । चक्षसे । जगत् । ज्योतिः । कृणोति । सूनरी । अप । द्वेषः । मघोनी । दिवः । उषाः । उच्छत् । अप । स्रिधः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 4 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे स्त्री जनो ! तुम जैसे (मघोनी) प्रशंसनीय धन का निमित्त (सूनरी) अच्छे प्रकार प्राप्त करानेवाली (दिवः) प्रकाशमान सूर्य्य की (दुहिता) पुत्री के सदृश (उषाः) प्रकाशने वाली प्रभात की वेला (विश्वम्) सब जगत् को (नानाम) आदर करता है, और उसको (चक्षसे) देखने के लिये (ज्योतिः) प्रकाश को (कृणोति) करती है और (स्रिधः) हिंसक (द्वेषः) बुरा द्वेष करनेवाले शत्रुओं को (अपोच्छत्) दूर वास कराती है वैसे पति आदि में वर्त्तो ॥८॥
Essence
इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे सती स्त्री विघ्नों को दूरकर कर्त्तव्य कर्मो को सिद्ध करती है, वैसे ही उषा डाकू, चोर, शत्रु आदि को दूर कर कार्य्य की सिद्धि कराने वाली होती है ॥८॥
Subject
फिर वह कैसी हो, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।