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Rigveda Mandal 1 / Sukta 48 / Mantra 7

191 Sukta
16 Mantra
1/48/7
Devata- उषाः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- विराट्पथ्याबृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
ए॒षायु॑क्त परा॒वतः॒ सूर्य॑स्यो॒दय॑ना॒दधि॑ । श॒तं रथे॑भिः सु॒भगो॒षा इ॒यं वि या॑त्य॒भि मानु॑षान् ॥

ए॒षा । अ॒यु॒क्त॒ । प॒रा॒ऽवतः॒ । सूर्य॑स्य । उ॒त्ऽअय॑नात् । अधि॑ । श॒तम् । रथे॑भिः । सु॒ऽभगा॑ । उ॒षाः । इ॒यम् । वि । या॒ति॒ । अ॒भि । मानु॑षान् ॥

Mantra without Swara
एषायुक्त परावतः सूर्यस्योदयनादधि । शतं रथेभिः सुभगोषा इयं वि यात्यभि मानुषान् ॥

एषा । अयुक्त । परावतः । सूर्यस्य । उत्अयनात् । अधि । शतम् । रथेभिः । सुभगा । उषाः । इयम् । वि । याति । अभि । मानुषान्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 4 Mantra » 2

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Meaning
हे स्त्री जनो ! जैसे (एषा) यह (उषाः) प्रातःकाल (सूर्य्यस्य) सूर्यमंडल के (उदयनात्) उदय से (अधि) उपरान्त (अध्यभ्ययुक्त) ऊपर सन्मुख से सब में युक्त होती है जिस प्रकार (इयम्) यह (सुभगा) उत्तम ऐश्वर्य्ययुक्त (रथेभिः) रमणीय यानों से (शतम्) असंख्यात (मानुषान्) मनुष्यादिकों को (वियाति) विविध प्रकार प्राप्त होता है वैसे तुम भी युक्त होओ ॥७॥
Essence
जैसे पतिव्रता स्त्रियां नियम से अपने पतियों की सेवा करती हैं। जैसे उषा से सब पदार्थों का दूर देश से संयोग होता है वैसे दूरस्थ कन्या पुत्रों का युवाऽवस्था में स्वयंवर विवाह करना चाहिये जिससे दूरदेश में रहनेवाले मनुष्यों से प्रीति बढ़े जैसे निकटस्थों का विवाह दुःखदायक होता है वैसे ही दूरस्थों का विवाह आनन्दप्रद होता है ॥७॥
Subject
फिर उषा के समान स्त्री जन हों, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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