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Rigveda Mandal 1 / Sukta 48 / Mantra 6

191 Sukta
16 Mantra
1/48/6
Devata- उषाः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- भुरिग्बृहती Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
वि या सृ॒जति॒ सम॑नं॒ व्य १॒॑ र्थिनः॑ प॒दं न वे॒त्योद॑ती । वयो॒ नकि॑ष्टे पप्ति॒वांस॑ आसते॒ व्यु॑ष्टौ वाजिनीवति ॥

वि । या । सृ॒जति॑ । सम॑नम् । वि । अ॒र्थिनः॑ । प॒दम् । न । वे॒ति॒ । ओद॑ती । वयः॒ । नकिः॑ । ते॒ । प॒प्ति॒वांसः॑ । आ॒स॒ते॒ विऽउ॑ष्टौ वा॒जि॒नी॒ऽव॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
वि या सृजति समनं व्य १ र्थिनः पदं न वेत्योदती । वयो नकिष्टे पप्तिवांस आसते व्युष्टौ वाजिनीवति ॥

वि । या । सृजति । समनम् । वि । अर्थिनः । पदम् । न । वेति । ओदती । वयः । नकिः । ते । पप्तिवांसः । आसते विउष्टौ वाजिनीवति॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 4 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे योगाभ्यास करनेहारी स्त्री ! आप जैसे (या) जो (ओदती) आर्द्रता को करती हुई (नकिः) शब्द को न करती (वाजिनीवती) बहुत क्रियाओं का निमित्त (उषाः) प्रातः समय (अर्थिनः) प्रशस्त अर्थ वाले का (पदं न) प्राप्ति के योग्य के समान (समनम्) सुन्दर संग्राम को जैसे (विवेति) व्याप्त होती है जिसकी (व्युष्टौ) दहन करनेवाली कान्ति में (पप्तिवांसः) पतनशील (वयः) पक्षी (आसते) स्थिर होते हैं वह वेला (ते) तेरे योगाभ्यास के लिये है इसको तू जान ॥६॥
Essence
इस मंत्र में उपमालंकार है। जैसे स्त्रियां व्यवहार से अपने पदार्थों को प्राप्त होती हैं वैसे उषा अपने प्रकाश से अधिकार को प्राप्त होती हैं जैसे वह दिन को उत्पन्न और सब प्राणियों को उठाकर अपने-२ व्यवहार में प्रवर्त्तमान कर रात्रि को निवृत्त करती और दिन के होने से दाह को भी उत्पन्न करती है वैसे ही सब स्त्री जनों को भी होना चाहिये ॥६॥
Subject
फिर वह कैसी हो, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।