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Rigveda Mandal 1 / Sukta 48 / Mantra 5

191 Sukta
16 Mantra
1/48/5
Devata- उषाः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- निचृत्पथ्याबृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
आ घा॒ योषे॑व सू॒नर्यु॒षा या॑ति प्रभुञ्ज॒ती । ज॒रय॑न्ती॒ वृज॑नं प॒द्वदी॑यत॒ उत्पा॑तयति प॒क्षिणः॑ ॥

आ । घ॒ । योषा॑ऽइव । सू॒नरी॑ । उ॒षाः । या॒ति॒ । प्र॒ऽभु॒ञ्ज॒ती । ज॒रय॑न्ती । वृज॑नम् । प॒त्ऽवत् । ई॒य॒ते॒ । उत् । पा॒त॒य॒ति॒ । प॒क्षिणः॑ ॥

Mantra without Swara
आ घा योषेव सूनर्युषा याति प्रभुञ्जती । जरयन्ती वृजनं पद्वदीयत उत्पातयति पक्षिणः ॥

आ । घ । योषाइव । सूनरी । उषाः । याति । प्रभुञ्जती । जरयन्ती । वृजनम् । पत्वत् । ईयते । उत् । पातयति । पक्षिणः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 3 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जो (योषेव) सत्स्त्री के समान (प्रभुंजती) अच्छे प्रकार भोगती (सूनरी) अच्छे प्रकार होती (जरयन्ती) जीर्णावस्था को करती (उषाः) प्रातसमय (पद्वत्) पगों के तुल्य (वृजनम्) मार्ग को (ईयते) प्राप्त होती हुई (याति) जाती और (पक्षिणः) पक्षियों को (उत्पातयति) उड़ाती है उस काल में सबको योगाभ्यास (घ) ही करना चाहिये ॥५॥ सं० भा० के अनुसार अच्छे प्रकार ले जाती। सं०
Essence
जैसे प्रातःकाल की वेला सब प्रकार से सुख की देनेवाली योगाभ्यास का कारण है उसी प्रकार स्त्रियों को होना चाहिये ॥५॥
Subject
फिर वह क्या करती है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।