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Rigveda Mandal 1 / Sukta 48 / Mantra 13

191 Sukta
16 Mantra
1/48/13
Devata- उषाः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- निचृत्पथ्याबृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
यस्या॒ रुश॑न्तो अ॒र्चयः॒ प्रति॑ भ॒द्रा अदृ॑क्षत । सा नो॑ र॒यिं वि॒श्ववा॑रं सु॒पेश॑समु॒षा द॑दातु॒ सुग्म्य॑म् ॥

यस्याः॑ । रुश॑न्तः । अ॒र्चयः॑ । प्रति॑ । भ॒द्राः । अदृ॑क्षत । सा । नः॒ । र॒यिम् । वि॒श्वऽवा॑रम् । सु॒ऽपेश॑सम् । उ॒षाः । द॒दा॒तु॒ । सुग्म्य॑म् ॥

Mantra without Swara
यस्या रुशन्तो अर्चयः प्रति भद्रा अदृक्षत । सा नो रयिं विश्ववारं सुपेशसमुषा ददातु सुग्म्यम् ॥

यस्याः । रुशन्तः । अर्चयः । प्रति । भद्राः । अदृक्षत । सा । नः । रयिम् । विश्ववारम् । सुपेशसम् । उषाः । ददातु । सुग्म्यम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 5 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे स्त्रि ! (यस्याः) जिसके सकाश से ये (रुशन्तः) चोर डांकू अन्धकार आदि का नाश और (भद्राः) कल्याण करनेवाली (अर्चयः) दीप्ति (प्रत्यदृक्षत) प्रत्यक्ष होती है (सा) जैसे वह (उषा) सुरूप के देनेवाली प्रभात की वेला (नः) हम लोगों के लिये (विश्ववारम्) सब आच्छादन करने योग्य (सुपेशसम्) शोभनरूप युक्त (रयिम्) चक्रवर्त्ति राज्य लक्ष्मी (सुग्म्यम्) सुख को (ददाति) देती है वैसी होकर तू भी हमको सुखदायक हो ॥१३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे दिन की निमित्त उषा के विना सुख वा राज्य के कार्य्य सिद्ध नहीं होते और सुरूप की प्राप्ति भी नहीं होती वैसे ही समीचीन स्त्री के विना यह सब नहीं होता ॥१३॥
Subject
फिर वह कैसी होकर क्या देवे, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।