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Rigveda Mandal 1 / Sukta 48 / Mantra 12

191 Sukta
16 Mantra
1/48/12
Devata- उषाः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
विश्वा॑न्दे॒वाँ आ व॑ह॒ सोम॑पीतये॒ऽन्तरि॑क्षादुष॒स्त्वम् । सास्मासु॑ धा॒ गोम॒दश्वा॑वदु॒क्थ्य १॒॑ मुषो॒ वाजं॑ सु॒वीर्य॑म् ॥

विश्वा॑न् । दे॒वान् । आ । व॒ह॒ । सोम॑ऽपीतये । अ॒न्तरि॑क्षात् । उ॒षः॒ । त्वम् । सा । अ॒स्मासु॑ । घाः॒ । गोऽम॑त् । अश्व॑ऽवत् । उ॒क्थ्य॑म् । उषः॑ । वाज॑म् । सु॒ऽवीर्य॑म् ॥

Mantra without Swara
विश्वान्देवाँ आ वह सोमपीतयेऽन्तरिक्षादुषस्त्वम् । सास्मासु धा गोमदश्वावदुक्थ्य १ मुषो वाजं सुवीर्यम् ॥

विश्वान् । देवान् । आ । वह । सोमपीतये । अन्तरिक्षात् । उषः । त्वम् । सा । अस्मासु । घाः । गोमत् । अश्ववत् । उक्थ्यम् । उषः । वाजम् । सुवीर्यम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 5 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (उषः) प्रभात के तुल्य स्त्रि ! मैं (सोमपीतये) सोम आदि पदार्थों को पीने के लिये (अन्तरिक्षात्) ऊपर से (विश्वान्) अखिल (देवान्) दिव्य गुण युक्त पदार्थों और जिस तुझ को प्राप्त होता हूं उन्हीं को तू भी (आवह) अच्छे प्रकार प्राप्त हो हे (उषः) उषा के समान हित करने और (सा) तू सब इष्ट पदार्थों को प्राप्त करानेवाली (अस्मासु) हम लोगों इन्द्रिय किरण और पृथिवी आदि से (अश्वावत्) और अत्युत्तम तुरंगों से युक्त (सुवीर्य्यम्) उत्तम वीर्य्य पराक्रम कारक (वाजम्) विज्ञान वा अन्न को (धाः) धारण कर ॥१२॥
Essence
इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे यह उषा अपने प्रादुर्भाव में शुद्ध वायु जल आदि दिव्य गुणों को प्राप्त कराके दोषों का नाश कर सब उत्तम पदार्थ समूह को प्रकट करती है वैसे उत्तम स्त्री गृह कार्य्य में हो ॥१२॥
Subject
फिर वह क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।