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Rigveda Mandal 1 / Sukta 48 / Mantra 10

191 Sukta
16 Mantra
1/48/10
Devata- उषाः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- निचृत्सतः पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
विश्व॑स्य॒ हि प्राण॑नं॒ जीव॑नं॒ त्वे वि यदु॒च्छसि॑ सूनरि । सा नो॒ रथे॑न बृह॒ता वि॑भावरि श्रु॒धि चि॑त्रामघे॒ हव॑म् ॥

विश्व॑स्य । हि । प्राण॑नम् । जीव॑नम् । त्वे इति॑ । वि । यत् । उ॒च्छसि॑ । सू॒न॒रि॒ । सा । नः॒ । रथे॑न । बृ॒ह॒ता । वि॒भा॒ऽव॒रि॒ । श्रु॒धि । चि॒त्र॒ऽम॒घे॒ । हव॑म् ॥

Mantra without Swara
विश्वस्य हि प्राणनं जीवनं त्वे वि यदुच्छसि सूनरि । सा नो रथेन बृहता विभावरि श्रुधि चित्रामघे हवम् ॥

विश्वस्य । हि । प्राणनम् । जीवनम् । त्वे इति । वि । यत् । उच्छसि । सूनरि । सा । नः । रथेन । बृहता । विभावरि । श्रुधि । चित्रमघे । हवम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 4 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सूनरि) अच्छे प्रकार व्यवहारों को प्राप्त (विभावरि) विविध प्रकाशयुक्त (चित्रामघे) चित्र विचित्र धन से सुशोभित स्त्री जैसे उषा (बृहता) बड़े (रथेन) रमणीय स्वरूप वा विमानादि यान से विद्यमान जिस में (विश्वस्य) सब प्राणियों के (प्राणनम्) प्राण और (जीवनम्) जीविका की प्राप्ति का संभव होता है वैसे ही (त्वे) तेरे में होता है (यत्) जो तू (नः) हम लोगों को (व्युच्छसि) विविध प्रकार वास करती है वह तू हमारा (हवम्) सुनने सुनाने योग्य वाक्यों को (श्रुधि) सुन ॥१०॥
Essence
इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे उषा से सब प्राणिजात को सुख होता है वैसे ही पतिव्रता स्त्री से प्रसन्न पुरुष को सब आनन्द होते हैं ॥१०॥
Subject
फिर वह कैसी होकर किससे क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।