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Rigveda Mandal 1 / Sukta 47 / Mantra 7

191 Sukta
10 Mantra
1/47/7
Devata- अश्विनौ Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- पथ्यावृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
यन्ना॑सत्या परा॒वति॒ यद्वा॒ स्थो अधि॑ तु॒र्वशे॑ । अतो॒ रथे॑न सु॒वृता॑ न॒ आ ग॑तं सा॒कं सूर्य॑स्य र॒श्मिभिः॑ ॥

यत् । ना॒स॒त्या॒ । प॒रा॒ऽवति॑ । यत् । वा॒ । स्थः । अधि॑ । तु॒र्वशे॑ । अतः॑ । रथे॑न । सु॒ऽवृता॑ । नः॒ । आ । ग॒त॒म् । सा॒कम् । सूर्य॑स्य । र॒श्मिऽभिः॑ ॥

Mantra without Swara
यन्नासत्या परावति यद्वा स्थो अधि तुर्वशे । अतो रथेन सुवृता न आ गतं साकं सूर्यस्य रश्मिभिः ॥

यत् । नासत्या । परावति । यत् । वा । स्थः । अधि । तुर्वशे । अतः । रथेन । सुवृता । नः । आ । गतम् । साकम् । सूर्यस्य । रश्मिभिः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 2 Mantra » 2

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Meaning
हे (नासत्या) सत्य गुण कर्म स्वभाव वाले सभा सेना के ईश ! आप (यत्) जिस (सुवृता) उत्तम अङ्गों से परिपूर्ण (रथेन) विमान आदि यान से (यत्) जिस कारण (परावति) दूर देश में गमन करने तथा (तुर्वशे) वेद और शिल्पविद्या के जानने वाले विद्वान् जन के (अधिष्ठः) ऊपर स्थित होते हैं (अतः) इससे (सूर्य्यस्य) सूर्य के (रश्मिभिः) किरणों के (साकम्) साथ (नः) हम लोगों को (आगतम्) सब प्रकार प्राप्त हूजिये ॥७॥
Essence
राजसभा के पति जिस सवारी से अन्तरिक्ष मार्ग करके देश देशान्तर जाने को समर्थ होवें उसको प्रयत्न से बनावें ॥७॥
Subject
फिर वे क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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