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Rigveda Mandal 1 / Sukta 47 / Mantra 6

191 Sukta
10 Mantra
1/47/6
Devata- अश्विनौ Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- निचृत्सतः पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सु॒दासे॑ दस्रा॒ वसु॒ बिभ्र॑ता॒ रथे॒ पृक्षो॑ वहतमश्विना । र॒यिं स॑मु॒द्रादु॒त वा॑ दि॒वस्पर्य॒स्मे ध॑त्तं पुरु॒स्पृह॑म् ॥

सु॒ऽदासे॑ । द॒स्रा॒ । वसु॑ । बिभ्र॑ता । रथे॑ । पृक्षः॑ । व॒ह॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । र॒यिम् । स॒मु॒द्रात् । उ॒त । वा॒ । दि॒वः । परि॑ । अ॒स्मे इति॑ । ध॒त्त॒म् । पु॒रु॒ऽस्पृह॑म् ॥

Mantra without Swara
सुदासे दस्रा वसु बिभ्रता रथे पृक्षो वहतमश्विना । रयिं समुद्रादुत वा दिवस्पर्यस्मे धत्तं पुरुस्पृहम् ॥

सुदासे । दस्रा । वसु । बिभ्रता । रथे । पृक्षः । वहतम् । अश्विना । रयिम् । समुद्रात् । उत । वा । दिवः । परि । अस्मे इति । धत्तम् । पुरुस्पृहम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 2 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (दस्रा) शत्रुओं के नाश करनेवाले (वसु) विद्यादिधन समूह को (बिभ्रता) धारण करते हुए (अश्विना) वायु और बिजुली के समान पूर्ण ऐश्वर्य युक्त आप ! जैसे (सुदासे) उत्तम सेवक युक्त (रथे) विमानादि यान में (समुद्रात्) सागर वा सूर्य से (उत) और (दिवः) प्रकाशयुक्त आकाश से पार (पृक्षः) सुख प्राप्ति का निमित्त (पुरुस्पृहम्) जो बहुत का इच्छित हो उस (रयिम्) राज्यलक्ष्मी को धारण करें वैसे (अस्मे) हमारे लिये (परिधत्तम्) धारण कीजिये ॥६॥
Essence
राज पुरुषों को योग्य है कि सेना और प्रजा के अर्थ नाना प्रकार का धन और समुद्रादि के पार जाने के लिये विमान आदि यान रचकर सब प्रकार सुख की उन्नति करें ॥६॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।