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Rigveda Mandal 1 / Sukta 47 / Mantra 4

191 Sukta
10 Mantra
1/47/4
Devata- अश्विनौ Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- सतःपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्रि॒ष॒ध॒स्थे ब॒र्हिषि॑ विश्ववेदसा॒ मध्वा॑ य॒ज्ञं मि॑मिक्षतम् । कण्वा॑सो वां सु॒तसो॑मा अ॒भिद्य॑वो यु॒वां ह॑वन्ते अश्विना ॥

त्रि॒ष्ऽसध॒स्थे । ब॒र्हिषि॑ । वि॒श्व॒ऽवे॒द॒सा॒ । मध्वा॑ । य॒ज्ञम् । मि॒मि॒क्ष॒त॒म् । कण्वा॑सः । वाम् । सु॒तऽसो॑माः । अ॒भिऽद्य॑वः । यु॒वाम् । ह॒व॒न्ते॒ । अ॒श्वि॒ना॒ ॥

Mantra without Swara
त्रिषधस्थे बर्हिषि विश्ववेदसा मध्वा यज्ञं मिमिक्षतम् । कण्वासो वां सुतसोमा अभिद्यवो युवां हवन्ते अश्विना ॥

त्रिष्सधस्थे । बर्हिषि । विश्ववेदसा । मध्वा । यज्ञम् । मिमिक्षतम् । कण्वासः । वाम् । सुतसोमाः । अभिद्यवः । युवाम् । हवन्ते । अश्विना॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 1 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (विश्ववेदसा) अखिल धनों के प्राप्त करनेवाले (अश्विना) क्षत्रियों के धर्म में स्थित के सदृश सभा सेनाओं के रक्षक ! आप जैसे (अभिद्यवः) सब प्रकार से विद्याओं के प्रकाशक और विद्युदादि पदार्थों के साधक (सुतसोमाः) उत्पन्न पदार्थों के ग्राहक (कण्वासः) मेधावी विद्वान् लोग (त्रिसधस्थे) जिसमें तीनों भूमि जल पवन स्थिति के लिये हों उस (बर्हिषि) अन्तरिक्ष में (मध्वा) मधुर रस से (वाम्) आप और (यज्ञम्) शिल्प कर्म को (हवन्ते) ग्रहण करते हैं वैसे (मिमिक्षतम्) सिद्ध करने की इच्छा करो ॥४॥
Essence
जैसे मनुष्य लोग विद्वानों से विद्या सीख यान रच और उसमें जल आदि युक्त करके शीघ्र जाने आने के वास्ते समर्थ होते हैं वैसे अन्य उपाय से नहीं इस लिये उसमें परिश्रम अवश्य करें ॥४॥
Subject
फिर वे कैसे हैं इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।