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Rigveda Mandal 1 / Sukta 47 / Mantra 3

191 Sukta
10 Mantra
1/47/3
Devata- अश्विनौ Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- पथ्यावृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अश्वि॑ना॒ मधु॑मत्तमं पा॒तं सोम॑मृतावृधा । अथा॒द्य द॑स्रा॒ वसु॒ बिभ्र॑ता॒ रथे॑ दा॒श्वांस॒मुप॑ गच्छतम् ॥

अश्वि॑ना । मधु॑मत्ऽतमम् । पा॒तम् । सोम॑म् । ऋ॒त॒ऽवृ॒धा॒ । अथ॑ । अ॒द्य । द॒स्रा॒ । वसु॑ । बिभ्र॑ता । रथे॑ । दा॒स्वांस॑म् । उप॑ । ग॒च्छ॒त॒म् ॥

Mantra without Swara
अश्विना मधुमत्तमं पातं सोममृतावृधा । अथाद्य दस्रा वसु बिभ्रता रथे दाश्वांसमुप गच्छतम् ॥

अश्विना । मधुमत्तमम् । पातम् । सोमम् । ऋतवृधा । अथ । अद्य । दस्रा । वसु । बिभ्रता । रथे । दास्वांसम् । उप । गच्छतम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 1 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विना) सूर्य्य वायु के समान कर्म और (दस्रा) दुःखों के दूर करनेवाले ! (वसु) सबसे उत्तम धन को (बिभ्रता) धारण करते तथा (ऋतावृधा) यथार्थ गुण संयुक्त प्राप्ति साधन से बढ़े हुए सभा और सेना के पति आप (अद्य) आज वर्त्तमान दिन में (मधुमत्तमम्) अत्यन्त मधुरादिगुणों से युक्त (सोमम्) वीर रस की (पातम्) रक्षा करो (अथ) तत्पश्चात् पूर्वोक्त (रथे) विमानादि यान में स्थित होकर (दाश्वांसम्) देने वाले मनुष्य के (उपगच्छतम्) समीप प्राप्त हुआ कीजिये ॥३॥
Essence
यहां वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे वायु से सूर्य्य चन्द्रमा की पुष्टि और अन्धेर का नाश होता है वैसे ही सभा और सेना के पतियों से प्रजास्थ प्राणियों की संतुष्टि दुःखों का नाश और धन की वृद्धि होती है ॥३॥
Subject
फिर वे कैसे हैं इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।